आजीविका का नया सवेरा — हिमाचल में डेयरी और पशुपालन आधारित आर्थिकी की अपार संभावनाएं
Awaz Janadesh SuperAdmin (Super Administrator)
Published Sep 30, 2026 at 03:35 AM • 13 views
संपादकीय
आजीविका का नया सवेरा — हिमाचल में डेयरी और पशुपालन आधारित आर्थिकी की अपार संभावनाएं
पहाड़ों की वादियां, कलकल बहती नदियां और यहाँ की आबोहवा जितनी खूबसूरत है, उतनी ही यहां के मेहनतकश लोगों की जीवनशैली संघर्षपूर्ण भी है। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में आज भी आजीविका के मुख्य स्रोतों में कृषि और पशुपालन की रीढ़ सबसे मजबूत है। लेकिन बदलते समय के साथ पारंपरिक खेती के तरीकों से परे जाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल देने के लिए कुछ ठोस, आधुनिक और बड़े कदमों की आवश्यकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य के युवा और किसान केवल पारंपरिक रोजगार पर निर्भर रहने के बजाय स्वरोजगार और विशेषकर डेयरी विकास (दुग्ध व्यवसाय) की तरफ आक्रामक रुख अपनाएं।
यदि हम देश के अन्य राज्यों के मॉडल पर नजर डालें, तो उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही 'नंदिनी कृषक समृद्धि योजना' या 'मिनी नंदिनी योजना' जैसी पहलें ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती हैं। उन योजनाओं के अंतर्गत उच्च नस्ल की देसी गायों (जैसे साहीवाल, गिर, और थारपारकर) की बड़ी डेयरी यूनिट स्थापित करने पर सरकार द्वारा 50% तक यानी लाखों रुपये का भारी-भरकम अनुदान (सब्सिडी) और आसान ऋण की सुविधा प्रदान की जाती है। इस तरह के कदम न केवल दुग्ध उत्पादन को बढ़ाते हैं, बल्कि किसानों की आय को भी कई गुना कर देते हैं।
हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां पशुपालन और जैविक डेयरी फार्मिंग के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। हमारे राज्य में 'हिम गंगे योजना' जैसी पहलें पहले से मौजूद हैं, जो दूध खरीद और सहकारी तंत्र को बढ़ावा दे रही हैं। परंतु, समय की मांग है कि हिमाचल सरकार भी उत्तर प्रदेश और अन्य अग्रणी राज्यों की तर्ज पर एक व्यापक "हिमाचल डेयरी संवर्धन एवं उद्यमिता योजना" की शुरुआत करे।
इस प्रकार की योजना से प्रदेश में निम्नलिखित बदलाव लाए जा सकते हैं:
* पलायन पर लगाम: ग्रामीण क्षेत्रों के युवा जो रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, उन्हें अपने ही गांव में बड़े पैमाने पर डेयरी और पशुपालन के जरिए आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलेगा।
* पहाड़ी नस्लों और दुग्ध उत्पादन का संरक्षण: उच्च नस्ल के गोवंश के संवर्धन से राज्य में दूध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार होगा, जिससे 'मिल्फेड' और अन्य सहकारी समितियों को और मजबूती मिलेगी।
* आर्थिक स्वावलंबन: जब किसानों को पशु खरीदने, शैड बनाने और आधुनिक उपकरणों के लिए सरकार की ओर से बड़ा वित्तीय अनुदान मिलेगा, तो ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।
'आवाज़ जनादेश' के माध्यम से हम सरकार और नीति निर्माताओं से यह पुरजोर अपील करते हैं कि हिमाचल के किसानों और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए डेयरी सेक्टर को एक 'उद्योग' का दर्जा दिया जाए और बड़े स्तर पर वित्तीय सहायता व अनुदान योजनाएं धरातल पर उतारी जाएं। देवभूमि का हर किसान और युवा तभी सशक्त होगा, जब उसकी मेहनत का सही मूल्य और आगे बढ़ने के लिए मजबूत सरकारी संबल मिलेगा।
आइए, मिलकर संकल्प लें कि हम हिमाचल को दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाएंगे और हर घर-आंगन में समृद्धि लाएंगे।
— राठौड़ राजेश रढाईक
प्रधान संपादक, आवाज़ जनादेश
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