हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय ई-गोष्ठी: पंच प्रण से विकसित भारत का संकल्प

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हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला में 3 अक्टूबर 2025 को “पंच प्रण पहल: मंतव्य, संकल्प एवं क्रियान्वयन” विषय पर एक महत्वपूर्ण ई-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में अखिल भारतीय आरोग्य भारती टीम (उत्तर एवं राजस्थान क्षेत्र) के सदस्य, अखिल भारतीय आरोग्य मित्र टीम के प्रमुख तथा आरोग्य भारती के पूर्व प्रांत प्रचारक हिमाचल प्रांत, श्री संजीवन जी उपस्थित हुए। विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में संकाय सदस्यों, शोधार्थियों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और विद्यार्थियों की व्यापक भागीदारी रही।
अपने संबोधन मे संजीवन जी ने कहा कि पंच प्रण पहल भारत के अमृत काल की दिशा और दशा तय करने वाली ऐतिहासिक पहल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब संकल्प बड़े होते हैं, तो मानवीय प्रयास भी बड़े होते हैं और सामूहिक शक्ति अपार हो जाती है। भारत अब अमृत काल में प्रवेश कर चुका है, जो आने वाले 25 वर्षों की वह अवधि है जिसमें राष्ट्र को एक विकसित और आत्मनिर्भर देश के रूप में खड़ा करना है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया भारत की ओर आशा और सम्मान के साथ देख रही है और वैश्विक समस्याओं का समाधान भारत की धरती से खोज रही है, जो हमारे दशकों के रचनात्मक प्रयासों और समस्या-समाधान की क्षमता का प्रमाण है।

मुख्य वक्ता ने पाँच प्रतिज्ञाओं—पंच प्रण—पर विस्तार से प्रकाश डाला। पहला प्रण, भारत को विकसित राष्ट्र बनाना; दूसरा, औपनिवेशिक मानसिकता के सभी अवशेषों से मुक्ति; तीसरा, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर गर्व; चौथा, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा; और पाँचवां, नागरिक कर्तव्यों का पालन। उन्होंने कहा कि इन पाँच प्रणों को हर नागरिक को जीवन में उतारना होगा। उन्होंने भाषाई विविधता पर भी विशेष जोर देते हुए कहा कि हर भारतीय को अपनी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषा पर गर्व करना चाहिए और औपनिवेशिक मानसिकता से ऊपर उठना चाहिए।

श्री संजीवन जी ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अनुसंधान, नवाचार, अंतरिक्ष विज्ञान और गहरे महासागर की खोज में सक्रिय भागीदारी निभाकर भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी नेतृत्व प्रदान करें। उन्होंने सूक्ष्म, लघु और कुटीर उद्योगों को भारत की आर्थिक और औद्योगिक प्रगति की रीढ़ बताया और “शून्य दोष, शून्य प्रभाव” के दृष्टिकोण को अपनाकर स्वदेशी क्षमताओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

अपने वक्तव्य में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंच परिवर्तन अभियान का भी उल्लेख किया और कहा कि इसमें पाँच प्रमुख स्तंभ शामिल हैं—सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, पारिवारिक प्रबोधन, स्व एवं आत्मनिर्भरता तथा नागरिक कर्तव्य। उन्होंने बताया कि सामाजिक समरसता के माध्यम से जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या समुदाय के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा। पर्यावरण संरक्षण से प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा होगी। पारिवारिक प्रबोधन से सामाजिक और नैतिक मूल्यों का विकास होगा। आत्मनिर्भरता से शिक्षा, कौशल और आर्थिक सशक्तिकरण बढ़ेगा और नागरिक कर्तव्य से लोकतंत्र एवं न्याय की रक्षा सुनिश्चित होगी।

श्री संजीवन जी ने कहा कि भारत की पारंपरिक जीवनशैली, योग, आयुर्वेद, हॉलिस्टिक हेल्थकेयर और पारिवारिक मूल्य आज विश्व को समाधान देने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे आत्मनिर्भर भारत अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानें बल्कि इसे सामाजिक जन आंदोलन के रूप में देखें। उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती शक्ति, वैश्विक सम्मान और सांस्कृतिक विरासत मिलकर पंच प्रण की शक्ति से भारत को सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनाएंगे।

कार्यक्रम का समापन विविधता में एकता, सांस्कृतिक गौरव, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक समरसता और नागरिक उत्तरदायित्व की पुनः प्रतिज्ञा के साथ हुआ। श्री संजीवन जी ने कहा कि हर नागरिक का व्यक्तिगत कल्याण सामूहिक कल्याण से जुड़ा हुआ है। उन्होंने पंच प्रण से प्रेरित होकर महासंकल्प लेने और नागरिक सहभागिता को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने प्रतिभागियों को याद दिलाया कि हमें अपने कार्य, शिक्षा, कौशल और सामाजिक योगदान से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी है।

अंत में, श्री संजीवन जी ने पारंपरिक संस्कृत प्रार्थना “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” का स्मरण कर सभी के कल्याण की कामना की और उपस्थितजनों से आग्रह किया कि वे पंच प्रण और पंच परिवर्तन की भावना को आत्मसात कर एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें।

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