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घी का दीपक सात दिनों तक जलता रहा तो वहीं कृष्ण नगरी बनेगी

08-07-2019
आवाज जनादेश
सहयोगी
आज तक केसरी
हिमाचल प्रदेश
आनी
चमन शर्मा की धर्म यात्रा की रिपोर्ट
( खबर मंडी डैक्स कार्यालय )
देवभूमि हिमाचल मेले एंव त्योहारों क़ा प्रदेश है, यहाँ मनाए जाने वाले मेले किसी ना किसी कहानी से जुड़े हैं, तो आईए चलें जिला कुल्लू के आनी उपमंडल के एक ख़ूबसूरत गाँव ” बटाला ” जहाँ एक अनूठी सी परम्परा ने एक दूसरे को एक दूसरें को संजोकर रखा है ! आनी क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण क़ा एक मात्र मंदिर जिला कुल्लू के आनी मुख्यालय से मात्र 17 कि.मी. की दूरी पर स्थित एक ख़ूबसूरत गाँव ”बटाला ” में है !जिला कुल्लू में चाहे श्री कृष्ण मंदिर हो, चाहे भगवान श्री राम क़ा मंदिर हो कुल्लूवासियों ने इन मंदिरों को ” ठाकुर की उपाधि दी है , तो आईए जाने क्या है ठाकुर मुरलीधर मंदिर की स्थापना की कहानी, बटाला गाँव के श्री भूपेंद्र शर्मा ज़ी की ज़ुबानी, कहते हैं कि हजारों बर्ष पूर्व यहाँ पर शिंगला गाँव (रामपुर के साथ जिला शिमला से सटा एक गाँव )से एक उपासक ब्राह्मण आया था, वो अपने साथ एक शालिग्राम तथा नरसिंह भगवान की मूर्ति लेकर अपने मन में यह संकल्प करके रखा था कि जहाँ पर घी क़ा दीपक दिन-रात सात दिन तक जलता रहेगा, वही स्थान श्री कृष्ण नगरी ” से विख्यात होगा !औऱ ये सब क्रिया अन्य स्थानों पर करने के पश्चात सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ बटाला गाँव में सफ़ल हुई, उसी दौरान वृंदावन से श्रीकृष्ण की मूर्ति लाई गयी औऱ उसे यहाँ बटाला गाँव में स्थापित किया गया, इसलिए आज़ भी इस मंदिर को ”ठाकुर मुरलीधर” के नाम से जाना जाता है !श्री नगरी बटाला में पूरे साल पाँच त्यौहार मनाये जाते हैं, जिनमें से रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी, दशहरा, वसंतपंचमी औऱ इलाके भर में प्रसिद्ध ”फ़ाग मेला” जिसे देखने यहाँ जिला कुल्लू से ही नहीं अपितु शिमला, किन्नौर,मंडी से सटे गांवों से भी लोग फागुन के महीनें में यहाँ आते हैं !फ़ाग मेला हर वर्ष पौराणिक तथा वैदिक रीति रिवाज़ से पूर्णिमा को ही मनाया जाता है, इस दिन सुबह नौ से बारह बज़े तक होली की झांकी निकाली जाती है, औऱ झांकी के साथ मंदिर के चारों ओर परिक्रमा की जाती है, इस परिक्रमा में गाँव के बुजुर्ग ब्राह्मण ब्राह्मणभक्ति, नटाऊक, तथा निर्गुण जैसे भजनों से मंदिर को गुंजायमान कर देते हैं दोपहर के 12 बज़े के बाद ब्रह्मशक्ति क़ा अखंड पाठ, सुबह के 4 बज़े तक चलता रहता है ! इसी दौरान मंदिर प्रांगण में कृष्णभक्त कुल्ल्वी नाटी लगाकर फ़ाग मेले को मा औऱ भी आकर्षक बना देते हैं ! सुबह के चार बज़े के बाद श्री कृष्ण की रथ यात्रा बर्षभर में सिर्फ़ एक ही बार निकाली जाती है ! इस झांकी में अंगरक्षक के रूप में गौरु (एक प्रकार की बांस प्रजाति की लंबी लंबी लकड़ियाँ) 10-15 फ़ुट की लंबी-लंबी मशालों द्वारा वसुन (स्थानीय सहायकों )के द्वारा पालकी क़ा पहरा दिया जाता है, औऱ होलिका दहन के रूप में फ़ागबुट्टि (पुराने किल्टों को एक छोटी सी टांगरी पर रखकर) को जलाया जाता है, औऱ इसी जलते हुए किलटों के ढ़ेर के चारों तरफ़ ठाकुर मुरलीधर अपने ढ़ाई फ़ेरे पूरे करते हैं औऱ अगले बर्ष पुनः दर्शन देने के वादे के साथ इस फ़ाग मेले को समाप्त कर देते हैं ! ऎसी मान्यता है कि जो भी फ़ाग मेले के दौरान ठाकुर मुरलीधर की इस झांकी को देख लेता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है, यही कारण है कि इस झांकी को देखने के लिए दूर-दराज़ से लोग आते हैं ! पूरे हिमाचल में ठाकुर मुरलीधर क़ा यह एकमात्र ऎसा मंदिर है जहाँ पर पुजारी तथा वैसून(सहायक) पूरे साल निःस्वार्थ भाव से सेवाएं देते हैं, यहाँ तक कि यहाँ मंदिर में प्रयोग होने वाली वस्तुएं जैसे :- घी, चंदन, धूप, आटा, मक्खन तथा अन्य सामग्री पुजारी व वसनु द्वारा अपने घऱ से लायी जाती है, मंदिर के कारदार तथा कमेटी इस व्यवस्था को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं

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