सियासत की सूली पर हिमाचल का ‘हित’ – कब तक चलेगा यह दोषारोपण का खेल?
प्रधान संपादक
हिमाचल प्रदेश की राजनीति आज उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ जनहित के गंभीर मुद्दे दलों की आपसी ‘अहंकार’ और ‘नूराकुश्ती’ की भेंट चढ़ रहे हैं। राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grant) जैसे संवेदनशील और राज्य की आर्थिकी की रीढ़ माने जाने वाले विषय पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक का तमाशा बनना इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश के नेताओं के लिए ‘कुर्सी और कोसना’, ‘प्रदेश और प्रगति’ से बड़ा हो गया है।
सत्तापक्ष: केवल ‘विक्टिम कार्ड’ या ठोस रणनीति?
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह आरोप कि भाजपा प्रदेश के हितों के साथ खड़ी नहीं है, सुनने में गंभीर लगता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार केवल बैठकों और प्रस्तावों के भरोसे राज्य की नैया पार लगाना चाहती है? 16वें वित्त आयोग के समक्ष प्रभावी ढंग से पक्ष रखना सरकार का दायित्व है।
यदि सरकार को लगता है कि केंद्र भेदभाव कर रहा है, तो आंकड़ों की बाजीगरी के बजाय एक ऐसा ठोस आर्थिक मॉडल जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाता जो ‘आत्मनिर्भर हिमाचल’ के नारे को हकीकत में बदले? आपदा और अनुदान के नाम पर बार-बार केंद्र को कठघरे में खड़ा करना ‘राजनीतिक ढाल’ तो हो सकता है, लेकिन यह ‘वित्तीय समाधान’ नहीं है।
दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और भाजपा का सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार करना संसदीय गरिमा और जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि सरकार गुमराह कर रही थी, तो वहीं बैठकर तथ्यों के साथ उसे बेनकाब करने का साहस क्यों नहीं दिखाया गया?
एक तरफ भाजपा केंद्र की उदारता और करोड़ों के बजट के गुणगान करती है, तो दूसरी तरफ राज्य के संवैधानिक अधिकारों की सामूहिक लड़ाई से पैर पीछे खींच लेती है। ‘वॉकआउट’ करना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अपनी जवाबदेही से भागना है। क्या विपक्ष का काम सिर्फ यह कहना है कि “सरकार कंफ्यूज है”?
अनुच्छेद 275(1) के तहत मिलने वाला अनुदान हिमाचल का संवैधानिक अधिकार है। क्या भाजपा के नेता केंद्र के सामने मजबूती से यह पक्ष रखने की हिम्मत जुटा पाएंगे, या वे केवल ‘दिल्ली’ के निर्देशों का इंतजार करेंगे?
सुक्खू सरकार आखिर कब तक ‘पिछली सरकारों’ और ‘केंद्र की बेरुखी’ का रोना रोकर अपनी वित्तीय विफलताओं को छिपाएगी? निवेश और राजस्व बढ़ाने के धरातलीय प्रयास कहाँ हैं?
केंद्र की योजनाओं में राज्य की हिस्सेदारी न दे पाना राज्य सरकार की प्रशासनिक अक्षमता है या जानबूझकर पैदा किया गया अवरोध? इसका खामियाजा तो आम हिमाचली भुगत रहा है।
आज हिमाचल को ‘दोषारोपण’ की नहीं, ‘दृष्टिकोण’ की जरूरत है। मुख्यमंत्री को राजनीति के चश्मे से बाहर निकलकर कड़ा वित्तीय प्रबंधन दिखाना होगा, और विपक्ष को ‘पलायन’ छोड़कर एक जिम्मेदार प्रहरी की भूमिका निभानी होगी।
हिमाचल के संसाधन सीमित हैं और चुनौतियां पहाड़ जैसी ऊंची। यदि राजस्व घाटा अनुदान बंद होता है, तो इसकी मार किसी नेता की गाड़ी या बंगले पर नहीं, बल्कि प्रदेश के कर्मचारी, किसान और युवा पर पड़ेगी। नेताओं को समझना होगा कि सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन अगर प्रदेश आर्थिक रूप से खोखला हो गया, तो इतिहास किसी को माफ नहीं करेगा।
“जब सत्ता और विपक्ष जनहित के मंच को रणक्षेत्र बना देते हैं, तब सबसे पहले सत्य और जनता की उम्मीदों की हत्या होती है।”
सियासत की सूली पर हिमाचल का ‘हित’ – कब तक चलेगा यह दोषारोपण का खेल ?
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