वैश्विक अशांति के भंवर में ‘भारत’: संतुलन और शांति का नया सेतु

वैश्विक भू-राजनीति के वर्तमान दौर में दुनिया जिस मुकाम पर खड़ी है,उसे’अस्थिरता का युग’ कहना गलत नहीं होगा। एक ओर जहाँ पुरानी व्यवस्थाएं चरमरा रही हैं, वहीं दूसरी ओर शक्ति के नए केंद्र उभर रहे हैं। 2026 की शुरुआत वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप, यूक्रेन और मध्य-पूर्व में जारी संघर्षों और व्यापार युद्ध की कड़वाहट के साथ हुई है। इस उथल-पुथल के बीच भारत की भूमिका एक’विश्व-मित्र’और’स्थिरता के स्तंभ’के रूप में उभरी है।
वर्तमान परिदृश्य: एक विभाजित दुनिया
आज दुनिया शीत युद्ध के बाद के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा संकट ने न केवल मानवीय संकट पैदा किया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी झकझोर दिया है। हाल ही में वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन और उस पर अमेरिकी रुख ने लैटिन अमेरिका में भी तनाव बढ़ा दिया है। ‘ग्लोबल पीस इंडेक्स 2025-26’ के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के लगभग 78 देश किसी न किसी रूप में संघर्षों में उलझे हुए हैं।
भारत का ‘संतुलन सिद्धांत’: तटस्थता नहीं, सक्रियता
भारत की विदेश नीति अब केवल “गुटनिरपेक्षता” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) पर आधारित है। भारत ने सिद्ध किया है कि वह रूस के साथ अपनी पुरानी दोस्ती निभाते हुए भी अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर सकता है।
* रूस-यूक्रेन: पीएम मोदी का यह बयान कि “यह युद्ध का युग नहीं है”, आज वैश्विक शांति का मंत्र बन चुका है। भारत ने युद्ध के बजाय संवाद और कूटनीति का पक्ष लिया है।
* पश्चिम एशिया: भारत एक तरफ इजरायल के साथ ‘जीरो टॉलरेंस’ के मुद्दे पर खड़ा है, तो दूसरी तरफ गाजा में शांति और मानवीय सहायता के लिए भी निरंतर आवाज उठा रहा है।
3. ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज
जब विकसित देश अपनी सीमाओं और स्वार्थों की रक्षा में लगे हैं, तब भारत ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आशा बनकर उभरा है। 2026 में BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वैश्विक प्रशासन (Global Governance) में सुधार की आवश्यकता है।
* आर्थिक नेतृत्व: अमेरिकी टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत की 7.4% की अनुमानित विकास दर दुनिया के लिए एक मिसाल है।
* मानवीय दृष्टिकोण: आपदा हो या युद्ध, भारत ‘प्रथम उत्तरदाता’ (First Responder) के रूप में सामने आता है, जो इसकी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को दर्शाता है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
बेशक, चुनौतियां कम नहीं हैं। अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीद पर लगाए जाने वाले टैरिफ की धमकी और पड़ोस में चीन-पाकिस्तान की बढ़ती जुगलबंदी भारत की कूटनीति की परीक्षा लेगी। भारत को अपनी सैन्य शक्ति (आत्मानिर्भर रक्षा क्षेत्र) और आर्थिक मजबूती के बीच एक बारीक संतुलन बनाए रखना होगा।
भारत आज केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक समाधान प्रदाता (Solution Provider) है। दुनिया को एक ऐसे ‘मध्यस्थ’ की आवश्यकता है जिस पर पूर्व और पश्चिम, दोनों भरोसा कर सकें। भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक शक्ति के मेल से उस भरोसे पर खरा उतर रहा है।
लेखक
प्रधान संपादक
राठौड़ राजेश रढाईक


