उपतहसील देहा की पंचायतों में ‘प्रशासनिक लापरवाही से विकास ठप,वन विभाग देहा पर जड़े आरोप

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‘प्रशासनिक लापरवाही से विकास ठप,वन विभाग देहा पर जड़े आरोप कहा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा तंत्र’

शिमला/ठियोग
हिमाचल प्रदेश के ठियोग उपमंडल में ग्राम पंचायतों और स्थानीय प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। पंचायतों ने प्रस्ताव के माध्यम से अपनी आप्ति जताई है।
ग्राम पंचायत पड़गैयां और घोड़ना द्वारा पारित हालिया प्रस्तावों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, स्थानीय नागरिकों में बढ़ते भ्रष्टाचार और ‘सफेद हाथियों’ (अक्षम अधिकारियों) के वर्चस्व को लेकर गहरा रोष व्याप्त है।
उन्होंने वन विभाग में ‘जूनियर राज’: वरिष्ठता की अनदेखी के आरोप लगाए है।

ग्राम पंचायत पड़गैयां (प्रस्ताव संख्या 09, दिनांक 27/11/2025) और ग्राम पंचायत घोड़ना (प्रस्ताव संख्या 08, दिनांक 25/11/2025) ने आधिकारिक तौर पर विभाग की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताई है। देहा रेंज के घोड़ना और घूण्ड वन खंडों में ‘उप-रेंजर’ (Block Officer) का पद लंबे समय से रिक्त है। पंचायतों का आरोप है कि इस महत्वपूर्ण पद का प्रभार पिछले कई वर्षों से एक जूनियर गार्ड को दिया गया है, जबकि नियमानुसार यह चार्ज किसी सीनियर गार्ड को मिलना चाहिए था।
प्रस्तावों में स्पष्ट किया गया है कि स्थानीय लोगों को T.D. (Timber Distribution) की स्वीकृति के लिए रेंज ऑफिसर (RO) को मौके पर बुलाना पड़ता है, जो व्यस्तता के कारण संभव नहीं हो पाता। इससे ग्रामीणों के जरूरी काम महीनों लटके रहते हैं।
पंचायतों ने सर्वसम्मति से मांग की है कि किसी वरिष्ठ गार्ड को चार्ज दिया जाए या तुरंत नया उप-रेंजर नियुक्त किया जाए।
स्थानीय लोगों ने भी इस प्रकरण में गहरी चिंता जाहिर करते हुए एक हस्त लेख के माध्यम से चिंता जाहिर की है और लिखा है कि देहा रेंज में “‘ घोटाला कौन कर रहा है ?सी

पंचायती प्रस्तावों के साथ-साथ एक हस्तलिखित पत्र (शायद किसी स्थानीय जागरूक नागरिक द्वारा) ने प्रशासन की जड़ों में बैठे भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने व्यवस्था पर सवाल करते हुए जानत को भी सहभागी बनाया है उन्होंने कहा कि प्रदेश भर में लगभग 80% लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो चुके हैं, जहाँ गलत काम करवाने के लिए घूस या राजनीतिक रसूख का सहारा लिया जाता है। लेखक ने उच्च पदों पर बैठे अक्षम अधिकारियों को ‘सफेद हाथी’ करार दिया है, उन्होंने कहा है कि जिनका संरक्षण भ्रष्टाचार को फलने-फूलने में मदद करता है।
पत्र में चिंता जताई गई है कि बेरोजगारी और गलत नीतियों के कारण युवा नशे की ओर धकेले जा रहे हैं। साथ ही, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को भी लाचार बताया गया है। उन्होंने कहा है कि अधिकतर मीडिया घराने ऐसे मामलों से दूरी बनाए हुए है, लेकिन जो उजागर कर रहा है उन्हें धमकाया जा रहा है या फिर उनकी आवाज को कुचलने का कार्य हो किया जा रहा है।
पत्र में उन्होंने न्यायालय में जाने की बात की है उन्होंने कहा अब केवल ‘कोर्ट’ ही एकमात्र उम्मीद की किरण बची है।
पंचायतों की नाराजगी के मायने केवल दो पंचायतों का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि एक व्यापक प्रशासनिक विफलता का संकेत है। जब जूनियर कर्मचारियों को सीनियर पदों का प्रभार दिया जाता है, तो न केवल अनुशासन भंग होता है, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

पंचायतों का सीधे तौर पर उच्चाधिकारियों को पत्र लिखना दर्शाता है कि निचले स्तर पर सुनवाई नहीं हो रही है।हस्तलिखित पत्र इस बात का प्रमाण है कि आम जनता अब सरकारी तंत्र को ‘घोटालों का घर’ मानने लगी है। यह जन-असंतोष किसी भी समय बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। पंचायतों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब व्यवस्था की खामियों को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। यदि वन विभाग और जिला प्रशासन ने तुरंत इन रिक्त पदों को नहीं भरा और व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं लाई, तो यह मामला प्रदेश स्तर पर तूल पकड़ सकता है।

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