विशेष रिपोर्ट: माफिया के चंगुल में चौपाल, प्रशासन की ‘खामोशी’ बनी विनाश का कवच

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नदी, जंगल और जमीन का सरेआम चीरहरण; रसूखदारों की कोठियां सजाने के लिए उजाड़े जा रहे पहाड़
चौपाल (हिमाचल प्रदेश): देवभूमि के नाम से विख्यात चौपाल का अंचल इन दिनों माफियाओं की चारागाह बन गया है। जल, जंगल और जमीन—तीनों प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा निर्मम दोहन पहले कभी नहीं देखा गया। ताज्जुब की बात यह है कि इस महाविनाश पर प्रशासन ने ‘धृतराष्ट्र’ की तरह अपनी आँखें मूंद ली हैं। स्थानीय जनता चीख-चीखकर माफिया राज की दुहाई दे रही है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे नेता सबूतों की मांग कर रहे हैं।
PWD की कार्यप्रणाली पर सवाल: कहाँ से आ रहे M-17?
सबसे बड़ा सवाल लोक निर्माण विभाग (PWD) की भूमिका पर खड़ा होता है। जब चौपाल में ठेकेदारों द्वारा सैकड़ों ‘Dra’ (पेड़/कलमे) अवैध रूप से काट दी गई हैं, तो विभाग उन्हें करोड़ों के बिल कैसे जारी कर रहा है?
* M-17 का रहस्य: आखिर इन कार्यों के लिए भारी मात्रा में निर्माण सामग्री और मशीनरी (M-17) कहाँ से दिखाई जा रही है?
* फर्जीवाड़े की आशंका: क्या यह सब कागजी हेरफेर और ‘फ्रॉड’ के जरिए सरकारी खजाने को चूना लगाने का खेल है? जनता पूछ रही है कि सरेआम कट रहे पेड़ों का जिम्मेदार कौन है और किसके संरक्षण में यह कुल्हाड़ी चल रही है?

सड़क की आड़ में रसूखदारों की ‘अय्याशी’

चौपाल के जंगलों से लकड़ी की तस्करी केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि शिमला के रसूखदारों और बड़े साहबों की कोठियों की सजावट के लिए हो रही है।
* तस्करी का खेल: रियाउनी के जंगलों से आ रही खबरें डरावनी हैं। वहां ग्रामवासियों के अनुसार सैकड़ों पेड़ों को काटकर ठिकाने लगाया जा रहा है। जब चौपाल मुख्यालय के सामने ही जंगल मिटने की कगार पर है तो पूरे चौपाल के जंगलों की क्या स्थिति होगी। यह अनुमान लगाया जा सकता है।
* होटल और बंगले: बड़े-बड़े होटलों और निजी बंगलों के निर्माण के लिए चौपाल की संपदा को कौड़ियों के दाम लूटा जा रहा है।

साक्ष्य मिटाने की कोशिश: फॉरेस्ट विभाग ने क्यों जलाए स्लीपर?

बंगापानी के पास फॉरेस्ट विभाग की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में है। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग ने पकड़े जाने के डर से सैकड़ों स्लीपर और जंगल के ठूंठ (Stumps) जलाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश की है। अगर विभाग बेकसूर था, तो उन लकड़ियों को नीलाम करने के बजाय जलाया क्यों गया?
पहाड़ियों का अस्तित्व खतरे में: मिट गए कई शिखर
अवैध खनन ने चौपाल की भौगोलिक स्थिति बदल दी है। चौपाल की कई छोटी पहाड़ियां अब नक्शे से गायब हो चुकी हैं। मनरेगा से लेकर सड़क निर्माण तक, हर जगह माफिया सक्रिय है। हालत यह है कि चौपाल अब विकास के नाम पर ‘बिहार’ की तर्ज पर अराजकता का केंद्र बनता जा रहा है।
धमकियों के साये में जनता: ‘खुमलिया’ का खेल
हैरानी की बात यह है कि जो लोग इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, उन्हें फोन पर धमकियां दी जा रही हैं। चुप रहने के लिए ‘खुमलिया’ (दबाव/सेटलमेंट) की जा रही है। सवाल यह है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को दबाने की हिम्मत इन माफियाओं में कहाँ से आई?

बड़ा सवाल: आखिर सरकार और जांच एजेंसियां (Vigilance ) अभी तक मौन क्यों हैं? क्या प्रशासन किसी ‘बड़े नाम’ को बचाने की कोशिश कर रहा है? चौपाल की जनता अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

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