आवाज़ जनादेश / न्यूज़ ब्यूरो शिमला
शिमला के हृदयस्थल, लक्कड़ बाज़ार में एक विडंबनापूर्ण तस्वीर सामने आती है। जहाँ एक ओर पुलिस स्टेशन कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए तत्पर है, वहीं दूसरी ओर, ठीक उसके नज़दीक एक शराब की दुकान निर्बाध रूप से अपना कारोबार चलाने की तैयारी कर रहा है। यह न केवल नागरिकों के बीच आश्चर्य का विषय है, बल्कि “नशा रोको अभियान” की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय निवासियों और दुकानदारों में इस स्थिति को लेकर आक्रोश और हैरानी दोनों है। कई लोगों का मानना है कि पुलिस स्टेशन के इतने करीब शराब की दुकान का होना प्रशासन की मंशा पर संदेह पैदा करता है। एक स्थानीय दुकानदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह कैसा नशा रोको अभियान है जब पुलिस की नाक के नीचे शराब बिक रही है? क्या शराबी उनसे डरेंगे क्या पुलिस हर रोज शराबियों को ही लेकर चली रहेगी यह एक सोचने वाला विषय है ?”
वहीं, जब इस बारे में पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने इस मामले पर सीधी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। कुछ अधिकारियों ने दबी जुबान में यह ज़रूर स्वीकार किया कि यह स्थिति थोड़ी अजीब है, लेकिन उन्होंने कोई ठोस कार्रवाई करने की बात नहीं कही। सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस स्टेशन की निकटता शराब की खपत से जुड़ी अवैध गतिविधियों पर निगरानी रखने में मददगार साबित हो सकती है, या यह सिर्फ एक सुविधाजनक स्थान है। जहाँ कानून के आंगन में हर रोज हटकेलियां होती रहेगी और कानून की धज्जियाँ उड़ती रहेगी।
इस विरोधाभासी स्थिति ने कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। एक तरफ पुलिस नशे के खिलाफ अभियान चला कर सैंकड़ों लोगों को सलाखों के पीछे धकेल रही है। वहीं दूसरी तरफ उनके चौकी के दरवाजे पर शराब का तम्बू खड़ा किया जा रहा हैं। उसके सामने शराब की दुकान का बेरोक टोक चलना प्रशासन की दोहरी नीति को दर्शाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विडंबनापूर्ण सह-अस्तित्व आने वाले दिनों में कोई बदलाव लाता है या यह शिमला के लक्कड़ बाज़ार की एक कड़वी सच्चाई बनकर रह जाता है। या फिर शिमला पुलिस के नशे के खिलाफ कड़े अभियान को दृष्टिगत सार्वजनिक नशे पर विराम लगा ।


