📰 संपादकीय: व्यवस्था की लाचारी, कोचिंग मंडी का हावी प्रभाव और भटकती युवा ऊर्जा
देश की युवा शक्ति जब किसी राष्ट्र की रीढ़ कही जाती है, तो उसकी नींव में भरोसा और निष्पक्षता होनी चाहिए। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में, भारत का युवा एक अभूतपूर्व असंतोष और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ वैश्विक पटल पर ‘उभरते भारत’ का नैरेटिव और ढांचागत विकास के बड़े-बड़े दावे हैं, तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि देश का मेधावी युवा लगातार लीक होते प्रश्नपत्रों, निरस्त होती परीक्षाओं और कोचिंग सेंटरों के व्यावसायिक चक्रव्यूह में पिस रहा है।
वर्तमान सत्ता का नेतृत्व और वादों का फासला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से जन-आकांक्षाओं को एक बड़े राष्ट्रीय स्वप्न से जोड़ना रही है। उन्होंने आम नागरिक के मन में ‘बदलाव’ और ‘सशक्त भारत’ की जो अलख जगाई, उसी के बल पर उन्हें अपार जनसमर्थन मिला। लेकिन वर्तमान समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक और नैतिक चुनौती यह है कि ‘दावों की हुंकार’ और ‘जमीनी सच्चाइयों’ के बीच का फासला बढ़ता ही जा रहा है।
जहाँ विदेश नीति और कूटनीति के मोर्चों पर सख्त और मजबूत छवि कायम की गई, वहीं घरेलू मोर्चे पर—विशेषकर रोजगार, परीक्षा प्रणाली की पवित्रता और युवा कल्याण के स्तर पर—व्यवस्था चरमराती नजर आ रही है। सार्वजनिक परीक्षा कानून जैसे कठोर प्रशासनिक कदमों की घोषणा तो होती है, लेकिन जब तक संस्थागत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक युवाओं का गिरता मनोबल और टूटता भरोसा वापस पाना असंभव होगा।
सांस्कृतिक-राजनीतिक भूख और विखंडन का खतरा
आज का युवा एक अजीबोगरीब चौराहे पर खड़ा है। उसमें राजनीतिक जागरूकता और देश के मुद्दों पर अपनी राय रखने की तीव्र भूख तो है, लेकिन यह जागरूकता अक्सर सोशल मीडिया के दौर में ‘ट्रेंड्स’ और ‘अति-ध्रुवीकृत एजेंडों’ की भेंट चढ़ जाती है। चिंतन और वैचारिक गहराई की जगह क्षणिक आक्रोश ने ले ली है।
जब लाखों शिक्षित युवाओं के पास सुरक्षित रोजगार और पारदर्शी अवसर नहीं होते, तो उनकी यह कुंठा खतरनाक मोड़ लेती है। इसी असंतोष का लाभ उठाकर विभिन्न राजनीतिक दल और संकीर्ण वैचारिक समूह युवाओं को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता के खाँचों में बाँटने का प्रयास करते हैं। शिक्षा का मूल उद्देश्य जहाँ सांस्कृतिक चेतना और नैतिक संवर्धन होना चाहिए था, वहाँ शिक्षा केवल एक ‘प्रतियोगी परीक्षा’ बनकर रह गई है, जिससे युवा ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगने के बजाय विखंडित हो रही है।
कोचिंग मंडी का वर्चस्व और समर्पित होती प्रतिभाएँ
देश के परीक्षा तंत्र में लगा यह क्षरण केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक संकट बन चुका है। नीट (NEET) से लेकर विभिन्न राज्यों की भर्ती परीक्षाओं तक प्रश्नपत्रों का बार-बार लीक होना यह साबित करता है कि तंत्र में एक संगठित माफिया सक्रिय है। यह केवल एक गलती नहीं, बल्कि सालों तक एक छोटे से कमरे में आँखें फोड़कर तैयारी करने वाले छात्र के सपनों की हत्या है।
मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा की लाचारी ने ‘कोचिंग मंडी’ को जन्म दिया है। अरबों रुपयों के विज्ञापनों, टॉपरों के चेहरों की खरीद-फरोख्त और भ्रामक टीआरपी के दम पर इन संस्थानों ने एक ऐसा मनोवैज्ञानिक भय फैलाया है, जहाँ हर छात्र और अभिभावक खुद को विवश महसूस करता है। मेधावी प्रतिभाएँ अब ज्ञानार्जन के बजाय केवल एक ‘रैंक’ और कोचिंग ब्रांड का ‘पोस्टर बॉय’ बनकर रह गई हैं।
नई शिक्षा नीति (NEP) में रटंत विद्या के स्थान पर कौशल (Skills) और व्यावहारिक शिक्षा पर जोर दिया गया है। लेकिन जब तक पूरी व्यवस्था का अंतिम पैमाना केवल एक परीक्षा की मेरिट लिस्ट रहेगा, तब तक न तो कोचिंग माफिया का प्रभाव कम होगा और न ही युवाओं पर से तनाव का यह भारी बोझ हटेगा।
केवल दावों से नहीं, दूरदृष्टि से बनेगा भविष्य
भारत का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (युवा आबादी) देश की सबसे बड़ी ताकत भी बन सकता है और सही दिशा न मिलने पर सबसे बड़ा असंतोष भी। समय का तकाजा है कि सत्ता में बैठे नीति-नियंता केवल कठोर नियमों की कागजी घोषणाओं तक सीमित न रहें।
परीक्षा आयोजित करने वाली शीर्ष एजेंसियों (जैसे NTA) की पारदर्शी और सख्त जवाबदेही तय करनी होगी। इसके साथ ही, सरकारी नौकरियों के इर्द-गिर्द बने इस असामान्य दबाव को कम करने के लिए निजी क्षेत्र में भी पारदर्शी व सम्मानजनक रोजगार के रास्ते खोलने होंगे। यदि युवा भारत का भरोसा इसी तरह तंत्र से उठता रहा, तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक महाशक्ति बनने के सारे दावे खोखले साबित होंगे।


