मसीहाओं के गढ़ में दम तोड़ती मानवता और व्यवस्था
प्रधान संपादक,राजेश रढाईक की कलम से…..
कभी उत्तर भारत के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में शुमार रहने वाला इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) आज अपनी कार्यप्रणाली, प्रशासनिक शिथिलता और आपसी वर्चस्व की जंग के कारण सुर्खियों में है। समाज ने चिकित्सकों को ‘भगवान का दूत’ माना था, लेकिन आज IGMC की दहलीज पर खड़ा मरीज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। हालिया घटनाओं ने न केवल अस्पताल प्रशासन पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं, बल्कि आम जनता की आस्था को भी गहरा धक्का पहुँचाया है।
जब रक्षक ही भक्षक की छवि में दिखने लगें

अस्पताल में हाल ही में मरीज के साथ हुई हाथापाई और बदतमीजी ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। विवाद इलाज को लेकर नहीं, बल्कि व्यवहार को लेकर था। सवाल यह है कि क्या एक बीमार व्यक्ति और उसके तीमारदार के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार किसी भी सभ्य समाज या चिकित्सा जगत में स्वीकार्य है? चिकित्सकों की हड़ताल और गोलबंदी ने यह अहसास कराया कि उन्हें अपने साथी की ‘गलती’ का बचाव तो याद रहा, लेकिन उस मरीज का ‘दर्द’ किसी को दिखाई नहीं दिया।
लापरवाही की लंबी फेहरिस्त: कौन देगा जवाब?
IGMC की फाइलों में ऐसे अनगिनत मामले दफन हैं, जहाँ गलत इलाज ने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया:
* केस 1: 28 अगस्त को अपने पैरों पर चलकर आया एक व्यक्ति ‘गलत दवा’ के कारण मौत के मुंह में धकेल दिया गया। PGI चंडीगढ़ के डॉक्टरों ने 47 दिनों तक वेंटिलेटर पर लड़ने के बाद उसे जीवनदान तो दिया, लेकिन वह आज भी बिस्तर पर है। एक पिता अपनी बेटी का कन्यादान तक नहीं कर पाया—इस मानसिक और शारीरिक क्षति की भरपाई कौन करेगा?
* केस 2: एक महिला जिसका गलत इलाज शुरू हुआ, आज उसकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं। 50 लाख रुपये खर्च करने के बाद वह आज भी डायलिसिस पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही है।
* केस 3: संवेदनहीनता की हद तब पार हो गई जब एक महिला की आंख का ऑपरेशन कथित तौर पर बिना सुन्न किए किया गया। उसकी चीखें अस्पताल की दीवारों में दबकर रह गईं।
राजनीति का अखाड़ा और निजी लैब का ‘खूनी’ खेल
आज IGMC स्वास्थ्य लाभ का केंद्र कम और राजनीति का अखाड़ा ज्यादा नजर आता है। वरिष्ठ और मेहनती चिकित्सक यहाँ काम करने से कतरा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल अस्पताल प्रशासन और MS (मेडिकल सुपरिटेंडेंट) की भूमिका पर है:
* सैंपल माफिया: रात 10 बजे के बाद सरकारी लैब के बजाय निजी लैब में सैंपल भेजने का ‘राज’ क्या है? वह कौन सी जांच है जो सरकारी तंत्र में मुमकिन नहीं, पर निजी लैब में तुरंत हो जाती है?
* फर्जी लैब रिपोर्ट: उस नर्स और गिरोह का क्या हुआ जो महीनों तक लोगों के खून के नमूने लेती रही और निजी लैब की रिपोर्ट पर IGMC के डॉक्टर इलाज करते रहे?
* जन औषधि की विफलता: MS ऑफिस के ठीक बाहर स्थित जन औषधि केंद्र में दवाइयां न मिलना अब रोज की बात है, जिससे तीमारदारों और स्टाफ के बीच आए दिन झगड़े होते हैं।
कड़े फैसले और प्रशासनिक सर्जरी की दरकार

यद्यपि मुख्यमंत्री ने डॉ. राघव के मामले में कड़ा रुख अपनाकर साहस दिखाया है, लेकिन यह केवल ‘सतही इलाज’ है। IGMC को गहरी सर्जरी की जरूरत है। महज एक डॉक्टर पर कार्रवाई काफी नहीं है; पूरे प्रशासनिक ढांचे, HODs की जवाबदेही और RKS (रोगी कल्याण समिति) की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
नेताओं को अपनी ‘वोट बैंक’ की चिंता है और डॉक्टरों को अपने ‘वर्चस्व’ की। लेकिन इस रस्साकशी में प्रदेश की आम जनता पिस रही है। यदि समय रहते इस संस्थान की गरिमा को बहाल नहीं किया गया, तो IGMC केवल एक भव्य इमारत बनकर रह जाएगा, जिसके भीतर मानवता पहले ही दम तोड़ चुकी होगी। सरकार को चाहिए कि वह एक प्रशासनिक जांच आयोग बिठाए जो यह तय करे कि आईजीएमसी शिमला इलाज का केंद्र बना रहे,न कि भ्रष्टाचार और बदतमीजी का।


