एम्स बिलासपुर के डॉ. नवनीत ने दो साल में कर दी 300 बड़ी प्लास्टिक सर्जरी, प्रगति रिपोर्ट में खुलासा

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आवाज़ जनादेश / न्यूज़ ब्यूरो शिमला

एक डॉक्टर, दो साल… और 300 से अधिक जटिल सर्जरियां। एम्स ने गंभीर क्रॉनिक किडनी रोग से पीड़ित मरीजों के लिए अब तक 100 से अधिक एवी फिस्टुला सर्जरी कर डायलिसिस की व्यवस्था सुचारु की। इससे मरीजों को चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों की ओर रुख नहीं करना पड़ता। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बिलासपुर के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के एकमात्र फैकल्टी सदस्य डॉ. नवनीत शर्मा ने इस उपलब्धि को अपने नाम किया है। प्लास्टिक सर्जरी सप्ताह के अवसर पर एम्स प्रशासन ने विभाग की प्रगति रिपोर्ट साझा की। इसमें बताया गया कि दो वर्ष के भीतर 300 से अधिक प्रमुख और 350 से अधिक लघु सर्जरियां सफलतापूर्वक की जा चुकी हैं।

जटिल चिकित्सा में भी अहम भूमिका निभाई

विभाग की सेवाएं केवल कॉस्मेटिक सर्जरी तक सीमित नहीं, बल्कि गंभीर चोटों, जलन, जन्मजात विकृतियों, कैंसर रिकंस्ट्रक्शन और डायलिसिस जैसी जटिल चिकित्सा में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। एम्स बिलासपुर में सिर से पांव तक की प्लास्टिक सर्जरी प्रक्रिया की जा रही है। इनमें क्रोनिक जख्मों के लिए स्किन ग्राफ्टिंग, ब्रैकियल प्लेक्सस और माइक्रोवस्कुलर नस-तंत्रिका की मरम्मत, पोस्ट-बर्न सर्जरी और हाथ की गंभीर चोटों का इलाज शामिल है। विभाग अन्य विशेषज्ञ विभागों जैसे ऑनकोसर्जरी, डेंटिस्ट्री और ईएनटी के साथ मिलकर ओरल कैंसर के बाद मरीजों की रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी कर रहा है। साथ ही एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के साथ संयुक्त रूप से 200 से अधिक डायबिटिक फुट रोगियों का उपचार किया जा चुका है।

जन्मजात दोषों की जटिल सर्जरियां भी सफल

बच्चों में क्लेफ्ट लिप-पैलेट, सिडैक्टली (जुड़ी उंगलियां), पॉलीडैक्टली (अतिरिक्त उंगलियां) और कान की प्लास्टिक सर्जरी जैसी दुर्लभ विकृतियों का सफल उपचार विभाग की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। यह सर्जरियां पहले प्रदेश के बाहर के संस्थानों पर निर्भर थीं।

एमसीएच रेजीडेंसी की शुरुआत, भविष्य की नींव

संस्थान ने प्लास्टिक सर्जरी विभाग में एमसीएच रेजीडेंसी प्रोग्राम शुरू किया है, जो भविष्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में चिकित्सा आधार मजबूत करेगा।

एक डॉक्टर की 24 घंटे सेवा ने बदला चिकित्सा परिदृश्य

डॉ. नवनीत शर्मा विभाग के इकलौते फैकल्टी हैं और चौबीस घंटे उपलब्ध रहकर न केवल ऑपरेशन कर रहे हैं, बल्कि मरीजों की देखरेख, फॉलोअप और ट्रेनिंग तक की जिम्मेदारी अकेले निभा रहे हैं।

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