हिमाचल के दिलों में आज भी धड़कता है वो मसीहा – “राजा साहब”

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आवाज जनादेश /न्यूज ब्यूरो शिमला

हिमाचल प्रदेश की मिट्टी में कुछ शख्सियतें ऐसी रची-बसी होती हैं कि वे सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि जीते-जागते किस्से बन जाती हैं। ऐसा ही एक नाम जो 23 जून 1934 को देव भूमि हिमाचल की धरती में जन्में वीरभद्र सिंह, जिन्हें हिमाचल की जनता ने केवल नेता नहीं, बल्कि अपने दिलों का ‘राजा साहब’ माना। 8 जुलाई, 2021 को, 87 वर्ष की आयु में, उनका भौतिक शरीर भले ही इस दुनिया से विदा हो गया, पर हिमाचल के गरीबों और आमजन के दिलों में उनकी यादें आज भी धड़कती हैं। लगभग चार साल बीत चुके हैं, लेकिन उनका जीवन, उनकी संघर्ष गाथा और हिमाचल के प्रति उनका अगाध प्रेम आज भी एक प्रेरणास्रोत है। उनका जाना सिर्फ एक राजनीतिक हस्ती का अंत नहीं था, यह उस युग का अवसान था, जहाँ राजनीति में जनसेवा, सिद्धांत और मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखा जाता था। वह उन गरीबों के सच्चे मसीहा थे, जिनके दिलों पर आज भी उनका एकछत्र राज है।

1962 से लेकर 2012 तक, चुनावी मैदान में उनका सामना कोई नहीं कर सका।उनकी सबसे बड़ी और अविस्मरणीय उपलब्धि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में छह बार1983 से 1985 पहली बार, फिर 1985 से 1990 तक दूसरी बार, 1993 से 1998 में तीसरी बार, 1998 में कुछ दिन चौथी बार, फिर 2003 से 2007 पांचवीं बार और 2012 से 2017 छठी बार मुख्यमंत्री बने थे।वीरभद्र सिंह ने पहली बार महासू लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। लोकसभा के लिए वीरभद्र सिंह 1962, 1967, 1971, 1980 और 2009 में चुने गए। उनका हर कार्यकाल विकास, स्थिरता और जन कल्याण को समर्पित रहा, जिससे गरीब और वंचितों को विशेष लाभ मिला।

केंद्रीय राजनीति में भी दमदार उपस्थिति: एक दूरदर्शी राष्ट्रीय नेता

हिमाचल की सीमाओं से परे, वीरभद्र सिंह ने राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी। उनकी वरिष्ठता और राज्य के अकेले सांसद होने के नाते, 2009 में उन्हें मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री (इस्पात मंत्रालय) का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया। इससे पहले भी, वे 1976-1977 तक नागरिक उड्डयन तथा पर्यटन राज्य मंत्री और 1982-1983 तक उद्योग राज्य मंत्री के रूप में केंद्र में अपनी सेवाएं दे चुके थे। यह उनकी राजनीतिक पहुँच और अनुभव का ही परिणाम था कि वे राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय फलक पर भी अपनी छाप छोड़ पाए।

वीरभद्र सिंह का जीवन संघर्षों से अछूता नहीं रहा। उन्होंने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे, आरोपों का सामना किया, लेकिन कभी अपने पथ से डिगे नहीं। उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा हिमाचल की जनता का अथाह प्रेम और विश्वास था, विशेषकर उन लोगों का, जिनके लिए वे एक सहारा थे। उनकी जीत सिर्फ चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि जनता के दिलों पर उनकी बादशाहत का प्रमाण थी। उनके जीवन से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, दृढ़ता और अपने मूल्यों पर टिके रहना कितना महत्वपूर्ण है।

उन्हें हिमाचल प्रदेश के ‘विकास पुरुष’ के रूप में याद किया जाता है। उनके कार्यकाल में राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए। उन्होंने हिमाचल के हर कोने तक विकास की किरण पहुँचाने का प्रयास किया, जिससे समाज के सबसे कमजोर तबके तक भी योजनाओं का लाभ पहुँचा। जनता के बीच उनकी सहजता, उनकी समस्याओं को सुनने की उनकी क्षमता और उनके प्रति उनका अपनत्व, उन्हें एक सच्चा जन नायक बनाता था। ‘राजा साहब’ के लिए राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं थी, बल्कि जनसेवा का माध्यम थी। वे हिमाचल के कोने-कोने से परिचित थे, हर वर्ग की समस्या को समझते थे। उन्होंने अपनी नीतियों और निर्णयों में हमेशा जनता के हित को सर्वोपरि रखा। उनके लिए सत्ता सेवा का एक साधन थी, न कि स्वार्थ का मार्ग। यही कारण है कि वह आज भी लाखों लोगों के दिलों में एक मसीहा के रूप में ज़िंदा हैं।

उनके जीवन से प्रेरणा लेकर, आज के राजनेताओं को यह आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या वे वास्तव में जनता की सेवा कर रहे हैं, या सिर्फ सत्ता की दौड़ में शामिल हैं। ‘राजा साहब’ का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची राजनीति वह है जो समाज को जोड़ती है, उसका उत्थान करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण करती है। करीब चार साल बीत चुके हैं, लेकिन हिमाचल की धरती पर ‘राजा साहब’ का नाम आज भी उतने ही सम्मान और प्रेम से लिया जाता है, मानो वे आज भी हमारे बीच हों। वह उन गरीबों के दिलों के राजा थे, हैं और हमेशा रहेंगे।

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