‘ सरकार गांव के द्वार’: सुशासन का ढोंग

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राठौड़ राजेश रढाईक

आवाज़ जनादेश/न्यूज ब्यूरो शिमला

हिमाचल प्रदेश में ‘सरकार गांव के द्वार’ का नारा बुलंद किया जा रहा है, लेकिन चौपाल के ननहार में शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के तथाकथित ‘जन-संवाद’ कार्यक्रम ने जिस ढोंग और लीपापोती को जोड़कर उजागर किया है, वह बेहद शर्मनाक है। यह सिर्फ जन-समस्याओं के समाधान का दिखावा नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में गहरे धंसे भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का जीता-जागता प्रमाण है। इससे भी अधिक स्टील की तरह कठोर सच्चाई यह है कि यह कार्यक्रम सरकार का नहीं, बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं का एक मंच था, जहाँ जनता की समस्याओं का जवाब संबंधित विभागों से लेने की बजाय केवल राजनीतिक बयानबाजी हावी रही।

1.75 करोड़ का स्कूल 11 साल में, और फिर भी ‘अधूरा’ – क्या यह विकास है या लूट का धंधा?

कार्यक्रम का सबसे बड़ा पाखंड राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ननहार के ‘नव-निर्मित’ भवन का लोकार्पण था। मंत्री ने जिस धूमधाम से इसका फीता काटा, उससे यह बात पूरी तरह से छिप गई कि यह भवन 2013 से निर्माणाधीन था – यानी पूरे 11 साल! एक करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाले इस भवन को बनाने में एक दशक से अधिक का समय लगा, और अब इसकी लागत 1.75 करोड़ रुपए बताई जा रही है। यह आंकड़ा न केवल पिछले विश्लेषण के 175 लाख रुपए की “टाइपिंग गलती” को उजागर करता है, बल्कि यह भी चीख-चीख कर कह रहा है कि 11 साल में 75% की लागत वृद्धि किस तरह के कुप्रबंधन, कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार का नतीजा है। क्या यही ‘समग्र विकास’ है, जहां एक स्कूल भवन को बनने में एक दशक से ज़्यादा का समय लगता है, और फिर भी ‘कुछ और कार्य प्रस्तावित’ रहते हैं, जिसके लिए मंत्री जी ‘संशोधित अनुमान’ भेजने के निर्देश देते हैं? इसका सीधा अर्थ है कि जनता के करोड़ों रुपए या तो अक्षमता की भेंट चढ़ गए, या फिर बंदरबांट का शिकार हुए। यह ‘सुशासन’ नहीं, बल्कि खुलेआम राजकोष की बर्बादी और जनता की आँखों में धूल झोंकने का निकृष्टतम उदाहरण है। इस पूरे प्रकरण में सरकारी तंत्र की जवाबदेही का अभाव और संबंधित विभाग की पूर्ण निष्क्रियता स्पष्ट रूप से उजागर हुई है, जिसने इस पूरे “विकास” को एक मज़ाक बना दिया है।

‘तत्काल समाधान’ का खोखला दावा और दशकों पुरानी समस्याओं की बाढ़: विभाग मौन, कार्यकर्ता मुखर

मंत्री जी ने दावा किया कि ‘सरकार गांव के द्वार’ में समस्याओं का ‘तत्काल’ समाधान हो रहा है। वाह! केवल 3 शिकायतें पहले से दर्ज थीं, और कुछ नई आईं, जिन पर ‘सहानुभूतिपूर्वक विचार’ होगा। 23 से अधिक मांगों पर भी यही ‘सहानुभूति’ दिखाई जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि ये शिकायतें और मांगें आखिर पैदा क्यों हुईं? क्या पिछले दशकों से इन समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया? अगर सरकार इतनी ‘जन-केंद्रित’ है, तो ये शिकायतें इतनी बड़ी संख्या में क्यों पहाड़ बनती गईं? स्थानीय कांग्रेस नेता का मंत्री जी से ‘आग्रह’ करना और जनता को ‘अपनी मांगें रखने की अपील’ करना ही बताता है कि यह कोई स्वतःस्फूर्त समस्या निवारण कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘शो’ था। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि किसी भी समस्या का जवाब संबंधित विभाग से नहीं लिया गया। मंच पर विभाग के अधिकारियों की उपस्थिति केवल औपचारिकता थी, क्योंकि सारी बातचीत और आश्वासन कांग्रेस कार्यकर्ताओं के माध्यम से ही दिए जा रहे थे। यह कार्यक्रम ‘सरकार’ का नहीं, बल्कि ‘कार्यकर्ताओं’ का मंच ज्यादा था, जहाँ जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान की बजाय केवल दिखावा किया गया। ‘मौके पर निराकरण’ का दावा कितना ठोस है, यह तो आने वाले वर्षों में पता चलेगा, जब जनता फिर उन्हीं समस्याओं से जूझ रही होगी। दशकों पुरानी समस्याओं को कुछ घंटों की ‘स्टेज-शो’ में सुलझा देना केवल एक सतही और दिखावटी समाधान है।

शिक्षा विभाग की ‘अभूतपूर्व’ उपलब्धियां: कागजी आंकड़े या जमीनी हकीकत का मज़ाक?

शिक्षा मंत्री ने अपने विभाग की ‘उपलब्धियों’ का लंबा-चौड़ा बखान किया: 1900 प्रिंसिपलों का नियमितीकरण, 5 साल बाद उपनिदेशकों की पदोन्नति, 105 कॉलेजों में प्रिंसिपल की नियुक्ति, शिक्षक भर्ती, सिंगापुर एक्सपोजर विजिट, एनटीटी और आया के पदों पर भर्ती, और शिक्षा बजट में रिकॉर्ड 9800 करोड़ की वृद्धि। ये आंकड़े केवल कागज़ों पर चमकदार दिखते हैं, लेकिन इनकी जमीनी हकीकत क्या है?

बैकलॉग की धीमी गति: 2016 से लंबित प्रिंसिपलों को अब नियमित किया जा रहा है। क्या यह ‘प्राथमिकता’ का लक्षण है, या पिछले 8 सालों की घोर लापरवाही का परिणाम?

शिक्षकों की कमी: शिक्षक भर्ती की बात तो की गई, लेकिन क्या दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षकों की वास्तविक कमी पूरी हुई है, या केवल कागज़ पर पद भरे गए हैं?

बजट की उपयोगिता: 9800 करोड़ रुपए का शिक्षा बजट निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन ननहार स्कूल भवन जैसे उदाहरण बताते हैं कि यह बजट किस तरह से निर्माण कार्यों में देरी, लागत वृद्धि और कमीशनखोरी का माध्यम बन रहा है। क्या यह बजट वास्तव में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में लग रहा है, या केवल कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं?
यहां भी, विभाग की वास्तविक कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं, क्योंकि केवल आंकड़ों का महिमामंडन किया जा रहा था, जमीनी हकीकत को दरकिनार करते हुए।

जल शक्ति और लोक निर्माण विभाग: भ्रष्टाचार और मंत्री की चुप्पी कई प्रश्न छोड़ गई?

यह विश्लेषण यहीं नहीं रुकता। चौपाल विधानसभा में जल शक्ति विभाग पर भी लोगों ने गंभीर सवाल उठाए और भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत कार्यवाही की मांग की। लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर भी लोगों ने विभाग को घेरा, भारी धांधलियां, निर्माण में देरी, अनियमितताएं और क्वालिटी पर भी सवाल दागे। आश्चर्यजनक रूप से, इन गंभीर आरोपों पर न तो मंत्री जी कोई उत्तर दे पाए और न ही विभाग का कोई अधिकारी मंच से जवाब दे सका। यह मंत्री जी और सरकारी तंत्र की मिलीभगत या अक्षमता का स्पष्ट संकेत है। जब जनता खुले मंच से भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगा रही है, और मंत्री सहित कोई भी अधिकारी जवाब नहीं दे पा रहा, तो यह ‘सुशासन’ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का नंगा नाच है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कैसे संबंधित विभाग के अधिकारियों को जानबूझकर जवाबदेही से दूर रखा गया और मंच का उपयोग केवल एक राजनीतिक शो के लिए किया गया। विभिन्न विभागों और स्वयं सहायता समूहों की प्रदर्शनियां लगाना केवल ‘शो’ का हिस्सा था, जब असली समस्याएं अनसुनी रह गईं।

*’सरकार गांव के द्वार’ – जुमलेबाजी का चरम और जनता से विश्वासघात*

ननहार का यह कार्यक्रम ‘सरकार गांव के द्वार’ की पोल खोलता है। यह केवल एक राजनीतिक ‘दिखावा’ था, जिसका उद्देश्य चुनावों से पहले जनता को लुभाना था। स्कूल भवन के निर्माण में 11 साल का समय और 75% लागत वृद्धि, जल शक्ति और लोक निर्माण विभागों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, और मंत्री जी की उन पर चुप्पी – ये सब हिमाचल प्रदेश में ‘सुशासन’ के दावों को पूरी तरह से ध्वस्त करते हैं। यह सब कुछ इस बात का ठोस प्रमाण है कि यह सरकार का नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी का एक मंच था, जहाँ कार्यकर्ताओं को बोलने की आजादी थी, लेकिन संबंधित विभागों के अधिकारियों को नहीं। जनता की समस्याओं का समाधान विभाग से नहीं, बल्कि राजनीतिक बयानबाजी से करने का प्रयास किया गया। जनता को सिर्फ आश्वासनों और कागजी आंकड़ों से संतोष नहीं करना होगा। जब तक सरकार अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं लाती, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाती, और लंबित परियोजनाओं को समय पर और सही लागत पर पूरा नहीं करती, तब तक ‘सरकार गांव के द्वार’ केवल एक खोखला जुमला बनकर रह जाएगा, जो जनता के विश्वास और उम्मीदों का घोर अपमान है। हिमाचल की जनता जवाब मांग रही है, और यह सरकार को देना ही होगा।

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