स्वास्थ्य सेवाओं पर सियासत और सिसकती संवेदनाएं

राजेश रढाईक
प्रधान संपादक आवाज़
जनादेश समाचार पत्र
हिमाचल प्रदेश विधानसभा का वर्तमान बजट सत्र केवल आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, बल्कि प्रदेश की सबसे बुनियादी जरूरत—’स्वास्थ्य’—पर एक वैचारिक युद्ध का मैदान बन गया है। सदन के भीतर कटौती प्रस्ताव पर हुई चर्चा ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ‘दावों और आरोपों’ की जो खाई है, उसमें कहीं न कहीं आम आदमी की उम्मीदें दम तोड़ रही हैं।
सदन की कार्यवाही में सबसे ज्वलंत मुद्दा ‘हिमकेयर’ और ‘आयुष्मान’ योजनाओं का रहा। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और विपक्ष के अन्य विधायकों का यह आरोप कि सरकार इस ‘संजीवनी’ रूपी योजना को बंद करने की साजिश रच रही है, एक गंभीर चिंता पैदा करता है। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में, जहाँ निजी अस्पतालों का खर्च उठाना आम आदमी के बस की बात नहीं है, वहाँ हिमकेयर जैसी योजनाओं का सुचारू रहना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय आवश्यकता है। विपक्ष का यह तर्क भी जायज प्रतीत होता है कि यदि योजना में भ्रष्टाचार हुआ है, तो दोषियों पर कार्रवाई हो, न कि पूरी योजना को ही संदिग्ध बनाकर बंद करने का माहौल तैयार किया जाए।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह कहना कि ‘हम केवल भाषण नहीं देते, व्यवस्था परिवर्तन करते हैं’, सरकार के ऊंचे इरादों को दर्शाता है। टांडा और हमीरपुर मेडिकल कॉलेजों के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करना और अत्याधुनिक पेट-स्कैन व MRI मशीनों की खरीद के दावे निश्चित रूप से सराहनीय हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। विधायक पवन काजल और डॉ. जनक राज द्वारा सदन में रखे गए तथ्य—जैसे टांडा में महीनों की वेटिंग, खराब लिफ्ट और आउटसोर्स कर्मचारियों का बकाया वेतन—सरकार के ‘आधुनिक स्वास्थ्य मॉडल’ की कलई खोलते हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या केवल रोबोटिक सर्जरी की बातें करने से प्रदेश का स्वास्थ्य सुधर जाएगा? जब प्रदेश के पीएचसी (PHC) और सिविल अस्पतालों में 85-85 पद खाली हों और अल्ट्रासाउंड के लिए मरीजों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़े, तो बजट की चमक फीकी पड़ जाती है। सरकार को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवाओं में ‘इंतजार’ का मतलब अक्सर ‘जान गंवाना’ होता है।
अंततः, लोकतंत्र में बहस नीतिगत सुधारों के लिए होनी चाहिए, न कि केवल श्रेय लेने या एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए। मुख्यमंत्री का यह आश्वासन कि ‘सुधार के लिए एक साल चाहिए’, जनता के धैर्य की परीक्षा है। ‘आवाज़ जनादेश’ का मानना है कि स्वास्थ्य जैसा संवेदनशील विषय राजनीति से ऊपर होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह हिमकेयर जैसी जनहितैषी योजनाओं को बिना किसी बाधा के जारी रखे और विपक्ष के रचनात्मक सुझावों को व्यवस्था सुधारने में शामिल करे।
जनता को ‘रोबोटिक सर्जरी’ के सपने से पहले, ‘स्ट्रेचर’ और ‘स्टाफ’ की उपलब्धता की गारंटी चाहिए।


