
शिमला के ‘कॉफी हाउस’ से सत्ता के शिखर तक: रूप दास कश्यप के संघर्ष और विकास की गाथा
विशेष फीचर: आवाज़ जनादेश
शिमला की वादियों में जहाँ देवदार के वृक्ष इतिहास की गवाही देते हैं, वहीं माल रोड पर स्थित इंडियन कॉफी हाउस राजनीति और बौद्धिक चर्चाओं का गढ़ रहा है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और वरिष्ठ राजनेता रूप दास कश्यप के लिए यह महज एक रेस्तरां नहीं, बल्कि वह पाठशाला थी जिसने एक सरकारी अधिकारी को राजनीति के शिखर तक पहुँचाया।
बंदिशों का दौर और 39 पैसे की कॉफी

रूप दास कश्यप बताते हैं कि 1977 के उस दौर में इंडियन कॉफी हाउस में एक कप कॉफी की कीमत महज 00.39 पैसे हुआ करती थी। यह स्थान ब्रिटिश काल से एक सोसाइटी द्वारा संचालित था और इसके अपने कड़े नियम थे। कश्यप याद करते हैं कि उस समय पूर्ण सिंह ठाकुर (भौंट निवासी) कमिश्नर थे। उस दौर में आम आदमी को इस स्थान पर आने की सहज अनुमति नहीं थी; यह एक बेहद विशिष्ट और आरक्षित वातावरण था।
राम मंदिर आंदोलन: जेल की सलाखें और वैचारिक दृढ़ता
कश्यप का जीवन केवल पदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विचारधारा के लिए संघर्ष भी किया। अयोध्या में विवादित ढांचे के समय उन्होंने जेल की सख्तियां झेलीं। इस आंदोलन में उनके साथ शिमला जिले के दिग्गज नेता:
* भगत राम चौहान
* सुरेश भारद्वाज
* खुशी राम बालनाटा
* और जिला शिमला के 150 अन्य समर्पित कार्यकर्ताओं ने भी गिरफ्तारी दी थी।
विकास के सूत्रधार: शहरी विकास मंत्री के रूप में कार्य
प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व वाली सरकार में शहरी विकास मंत्री रहते हुए रूप दास कश्यप ने शिमला की सूरत बदलने में अहम भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल की कुछ प्रमुख उपलब्धियां:

* शिमला का सुंदरीकरण: माल रोड और रिज के ऐतिहासिक स्वरूप को बनाए रखते हुए आधुनिक सुविधाएं बढ़ाना।
* पार्किंग एवं बुनियादी ढांचा: बढ़ते पर्यटन को देखते हुए शहर में पार्किंग की समस्या के समाधान और सड़कों के विस्तार की योजनाएं शुरू कीं।
* आम जनता की पहुंच: उन्होंने सचिवालय के बंद कमरों के बजाय जनता के बीच जाकर फैसले लेने की परंपरा को जीवित रखा, जो उन्होंने ‘कॉफी हाउस’ की संस्कृति से सीखी थी।
*हिमाचल प्रदेश में हाउस रिटर्निंग पॉलिसी पहली बार लेकर आना बहुत बड़ी पहल थी।
चुनावी सफर: हार से सीख और जीत का गौरव
* 1977: पहली बार आजाद उम्मीदवार के रूप में विधायक बनकर सबको चौंकाया।
* 1989 और 1998: पुनः विधानसभा पहुंचे और जनता का विश्वास जीता।
* 1990 लोकसभा: उन्होंने संसदीय चुनाव भी लड़ा, जिसमें उन्हें 23,000 मतों से पराजय झेलनी पड़ी, पर उन्होंने इसे जनसेवा का एक और सबक माना।
5-स्टार कल्चर बनाम कॉफी हाउस की सादगी
कश्यप अफसोस जताते हैं कि वर्तमान में राजनीति ‘चकाचौंध’ और ‘5-स्टार होटलों’ की बैठकों तक सिमट गई है। उनके दौर में कॉफी हाउस ही वह जगह थी जहाँ वकील, सेवानिवृत्त कर्मचारी और दिग्गज नेता एक साथ बैठकर गाँव की समस्याओं और सरकार के कामकाज की खरी-खरी समीक्षा करते थे।
रूप दास कश्यप कहते हैं कि उन्होंने शिमला को अपनी आँखों के सामने कई करवटें बदलते देखा है। ब्रिटिश विरासत वाले इस शहर में अब भले ही ऊँची इमारतें बन गई हों, लेकिन कॉफी हाउस की वह रूह आज भी पुरानी यादों में ताज़ा है।


