पंचायतों में प्रशासनिक पहरा और लोकतंत्र की चुनौतियां
हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के भंग होने और प्रशासनिक समितियों के गठन की ताजा अधिसूचना केवल एक सरकारी प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह राज्य की ग्रामीण लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक बड़े शून्य का संकेत भी है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का हवाला देकर चुनावों को स्थगित करना और सत्ता की चाबी अधिकारियों को सौंपना एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे अनिवार्य तो माना जा सकता है, लेकिन यह ‘आदर्श’ कतई नहीं है।
भारतीय संविधान का 73वां संशोधन सत्ता के विकेंद्रीकरण की वकालत करता है, ताकि गांव की योजना गांव के लोग ही बनाएं। अधिसूचना के अनुसार अब ग्राम पंचायतों में ‘प्रधान’ की जगह बीडीओ (BDO) और सचिव सर्वेसर्वा होंगे। नौकरशाही की अपनी कार्यशैली होती है, जो अक्सर नियमों और फाइलों में बंधी रहती है। इसके उलट, एक निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होता है। जब गांव का कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर पंचायत जाता है, तो उसे एक परिचित चेहरा मिलता है, लेकिन अब उसे सरकारी दफ्तरों की औपचारिकता से गुजरना होगा। क्या एक अधिकारी, जिसके पास पहले से ही कई ब्लॉकों का कार्यभार है, वह एक प्रधान की तरह जमीनी संवेदनशीलता दिखा पाएगा? यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
अधिसूचना में ‘मेकर और चेकर’ की जो व्यवस्था की गई है, वह वित्तीय अनुशासन के लिहाज से सराहनीय लग सकती है। सेंट्रल फाइनेंस कमीशन (CFC) के फंड का दुरुपयोग रोकने के लिए यह आवश्यक भी है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि विकास कार्यों की फाइलें अब प्रशासनिक लालफीताशाही (Red Tapism) का शिकार हो सकती हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना विकास कार्यों की प्राथमिकताएं तय करना अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। क्या वे वास्तव में वही काम करवाएंगे जिसकी गांव को जरूरत है, या वे केवल बजट ठिकाने लगाने की खानापूर्ति करेंगे?
लाहौल-स्पीति और पांगी जैसे दुर्गम क्षेत्रों को छोड़कर पूरे प्रदेश में एक साथ कमेटियों का राज स्थापित होना राज्य सरकार की चुनावी तैयारियों पर भी सवाल उठाता है। आपदा प्रबंधन का तर्क तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की जीवंतता समयबद्ध चुनावों में ही निहित है। इतिहास गवाह है कि जब-जब संस्थाओं का संचालन अधिकारियों के हाथ में गया है, तब-तब जनभागीदारी कम हुई है और भ्रष्टाचार के नए रास्ते खुले हैं।
सरकार को चाहिए कि इन प्रशासनिक कमेटियों को केवल ‘देखभाल करने वाली (Caretaker)’ व्यवस्था तक ही सीमित रखे। जितनी जल्दी हो सके, चुनावी प्रक्रिया को बहाल किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की जड़ें पंचायतों में होती हैं, और अगर जड़ें ही प्रशासनिक नियंत्रण में रहेंगी, तो स्वशासन का ढांचा कमजोर होगा। यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है कि इस संक्रमण काल में आम ग्रामीण को अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।


