​”अनसुलझे रहस्यों और अनछुए सौंदर्य की धरती: चौपाल का जादुई गाँव जबना”

Date:

कुदरत का करिश्मा और देवलोक की अलौकिक सैर में-जबना गांव

कलम से: राजेश रढाईक (प्रधान संपादक, आवाज जनादेश)
,
प्रकृति ने देवभूमि हिमाचल के आँचल को सुंदरता के जिन अनमोल मोतियों से सजाया है, उसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है। यहाँ की घनी वादियों के बीच स्थित प्राचीन देवालय न केवल हमारी आस्था के केंद्र हैं, बल्कि इस भूमि की दिव्यता का प्रमाण भी हैं। इसी श्रृंखला में शिमला जिले की चौपाल तहसील का गांव जबना एक ऐसा कुदरती करिश्मा है, जिसे देखकर लगता है कि विधाता ने इसे फुर्सत के क्षणों में तराशा होगा।
देवलोक सा सफर: जबना की ओर
जबना पहुँचने का मार्ग किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं है। यह सफर
केवल सड़क का नहीं, बल्कि अनगिनत देवालयों के दर्शन करते हुए ‘देवलोक’ की ओर बढ़ने का अहसास कराता है। शिमला से ठियोग और फिर सैंज होते हुए जब हम चौपाल मार्ग पर बढ़ते हैं, तो देहा के घने जंगलों की हरियाली हमारा स्वागत करती है—यह वह वन क्षेत्र है जिसे एशिया के सबसे विशाल जंगलों में गिना जाता है।

आस्था और प्रकृति का संगम: चंबी से दियून्दर तक
सफर में चंबी वह पड़ाव है जहाँ धरती से प्रकट होती पत्थर की मूर्तियाँ अनायास ही हिमाचल को ‘देवभूमि’ होने का गौरव प्रदान करती हैं। यहाँ से कुछ दूरी पर, लगभग 9200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित दियून्दर माता का भव्य मंदिर श्रद्धालुओं को सौभाग्य और शांति का आशीर्वाद देता है।
जैसे ही हम चंबी से बदलावग-झीना मार्ग पर बढ़ते हैं, प्रकृति अपनी गोद फैलाए खड़ी मिलती है। शीयुन्दर मंदिर और गागना गांव की ऐतिहासिक धरोहरें इस क्षेत्र की संपन्न संस्कृति की गवाह हैं। शिन्युन्दर का विशाल तालाब, जो घने देवदार के वृक्षों और दियुन्दर चोटी की छाया में स्थित है, मन को मोह लेता है। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन वनों को देवी माता का रूप माना जाता है; सदियों से यहाँ के वृक्षों की एक टहनी तक काटना वर्जित है, जो पर्यावरण संरक्षण का एक बेमिसाल उदाहरण है।
जबना: जहाँ बसते हैं देवता रिहाटना
चारों ओर त्रिशंकु आकार की पहाड़ियों और नुकीले देवदार के जंगलों के बीच बसा है—जबना। यहाँ देवता रिहाटना अपनी समस्त शक्तियों और कलाओं के साथ विराजमान हैं। गाँव के बीचों-बीच स्थित मंदिर और तीन विशालकाय देवदार के वृक्षों के बीच बना दूसरा मंदिर कौतूहल जगा देता है। ये वृक्ष इतने विशाल हैं कि इन्हें ‘राष्ट्रीय संपदा’ घोषित करना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यात्रा के मुख्य आकर्षण:
* ठलोग का विशु मेला: बैसाख मास की संक्रांति (14-15 मई) को लगने वाला यह मेला हजारों वर्षों से आपसी भाईचारे और जन-आस्था का प्रतीक है।
* पांडव कालीन पदचिह्न: घियालठ गांव के पास पांडव काल की तीन पिंडियां और मरगाली का शीतल झरना।
* शापड़ा की महिमा: यहाँ हर पांच साल में एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट होता है। वर्तमान में यहाँ एक साथ पांच शिवलिंगों के दर्शन करना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
स्वर्णिम इतिहास और अलौकिक अनुभूति
झीना पंचायत का इतिहास भी स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। यहाँ के महासती होने के प्रमाण और 1804 में निर्मित वन विभाग का रेस्ट हाउस बीते दौर की कहानियाँ सुनाते हैं। चाहे वह भोट गाँव के डोम देवता हों या शापड़ा की माता कढासन, यहाँ का हर कोना आध्यात्मिक ऊर्जा से लबरेज है।

जबना केवल एक गांव नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और अछूते सौंदर्य का एक ऐसा कोलाज है, जिसे हर पर्यटक और श्रद्धालु को अपने जीवन में एक बार जरूर देखना चाहिए।
जबना तक का यह अद्भुत सफर अभी थमा नहीं है… इस यात्रा के अगले पड़ाव और अनछुए पहलुओं के लिए जुड़े रहें हमारे अगले अंक के साथ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ मनुष्य की पाँच वस्तुएँ साथ जाती हैं?

मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ मनुष्य की पाँच...

हिमाचल में अवैध कब्जे करने वाले 1.60 लाख परिवार नहीं लड़ सकेंगे पंचायत चुनाव

हिमाचल में अवैध कब्जे करने वाले 1.60 लाख परिवार...

स्वास्थ्य सेवाओं पर सियासत और सिसकती संवेदनाएं

स्वास्थ्य सेवाओं पर सियासत और सिसकती संवेदनाएं राजेश रढाईक प्रधान...