साल में एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई बदलेव और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर रहने के लिए जाते हैं.
पुरी: ओडिशा के पुरी में आज यानी कि 14 जुलाई से सालाना रथ यात्रा (Rath Yatra) शुरू हो गई है. यूनेस्को द्वारा पुरी के एक हिस्सों को वर्ल्ड हेरिटेज यानी कि वैश्विक धरोहर की सूची में शामिल किए जाने के बाद से यह पहली रथ यात्रा है. इस बार की रथ यात्रा की थीम भी ‘धरोहर’ है. आपको बता दें कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा (Jagannath RathYatra) आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी से शुरू होती है. इस भव्य यात्रा में शामिल होने के लिए यहां दूर-दूर से लोग आते हैं.
जब रुक जाता है भगवान जगन्नाथ का रथ
एक बार रथयात्रा के दिन सालबेग पुरी से बाहर थे, उन्हें लगा की समय पर रथ यात्रा देखने के लिए पुरी पहुंच नहीं पाएंगे, फिर सालबेग ने प्रभु जगन्नाथ से विनती की, कि उनके पहुंचने तक वह इंतजार करें, फिर क्या हुआ भगवान जगन्नाथ ने अपना भक्त का बात मान ली,
प्रभु जगन्नाथ को भक्तों का भगवान कहा जाता है. जब-जब भक्तों ने भक्ति से पुकारा भगवान उस के साथ खड़े हुए नजर आए. यह कहा जाता है जब तक प्रभु जगन्नाथ का डोरी नहीं लगता तब तक प्रभु की दर्शन नहीं हो पाता है. कई ऐसा कहानी है जब प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों की विश्वास पर खड़े उतरे हैं.
कभी प्रभु अपने भक्त के लिए साक्षी देने के लिए निकल पड़ते हैं तो कभी दासिया नाम के एक दलित के हाथ से नारियल उठा लेते हैं. महाप्रभु जगन्नाथ के सामने न कोई जाती होता है न कोई धर्म जो भी भगवान जगन्नाथ को भक्ति से पुकारता है भगवान उस के भक्ति पर खड़े उतरते हैं.
ऐसी है भक्त सालबेग की कहानी
ऐसी ही एक कहानी भक्त सालबेग की है जो धर्म से तो मुस्लिम था, लेकिन प्रभु जगन्नाथ का सबसे बड़ा भक्त बन गया था. भक्त सालबेग के पिता मुस्लिम और माता ब्राह्मण थी. सालबेग का पिता मुगल आर्मी में सैनिक थे. अपने पिता के तरह सालबेग भी मुगल आर्मी में काम किये. एक बार युद्ध के दौरान सालबेग पूरी तरह घायल हो गए. जब सभी को लगा था कि सालबेग ठीक नहीं हो पाएंगे तब सालबेग के मां ने प्रभु जगन्नाथ के शरण में जाने के लिए कहा.
जगन्नाथ के आर्शीवाद से सालबेग पूरी तरह ठीक हो गए और प्रभु जगन्नाथ का बहुत बड़ा भक्त बन गए. सालबेग जगन्नाथ के भक्ति में कई सारे भक्ति कविता भी लिखे. एक बार सालबेग प्रभु जगन्नाथ से मिलने के लिए पुरी गए, लेकिन वह मुसलमान होने के वजह से उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया. फिर हर साल सालबेग रथ यात्रा के दौरान पूरी जाते थे और प्रभु जगन्नाथ की दर्शन करते थे.
रथ यात्रा क्या है?
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बालभद्र और देवी सुभद्रा अपने घर यानी कि जगन्नाथ मंदिर से रथ में बैठकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं. गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है.
रथ यात्रा में क्या होता है?
भगवान जगन्नाथ के रथ के सामने सोने के हत्थे वाले झाड़ू को लगाकर रथ यात्रा को आरंभ किया जाता है. उसके बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के बीच तीन विशाल रथों को सैंकड़ों लोग खींचते हैं. इस क्रम में सबसे पहले बालभद्र का रथ प्रस्थान करता है. उसके बाद बहन सुभद्रा का रथ चलता है. फिर आखिर में भगवान जगन्नाथ का रथ खींचा जाता है.
जब अपनी मौसी के घर पहुंचते हैं भगवान जगन्नाथ
गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है. रथ यात्रा के दौरान साल में एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहनों के साथ जगन्नाथ मंदिर से इसी गुंडिचा मंदिर में रहने के लिए आते हैं. अपनी मौसी के घर में भगवान एक हफ्ते तक ठहरते हैं, जहां उनका खूब आदर-सत्कार होता है. उन्हें कई प्रकार के स्वादिष्ट पकवानों और फल-फूलों का भोग लगाया जाता है.
अच्छे-अच्छे पकवान खाकर भगवान बीमार हो जाते हैं. फिर उन्हें पथ्य का भोग लगाया जाता है और वह जल्दी ठीक हो जाते हैं. गुंडिचा मंदिर में इन नौ दिनों में भगवान जगन्नाथ के दर्शन को आड़प-दर्शन कहा जाता है. जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है. इन दिनों विशेष रूप से नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुए का प्रसाद मिलता है. फिर दिन पूरे होने के बाद भगवान जगन्नाथ अपने घर यानी कि जगन्नाथ मंदिर वापस चले जाते हैं.
रथ यात्रा का शुभ मुहूर्त
आषाढ़ शुक्ल की द्वितीया तिथि 14 जुलाई की सुबह 4 बजकर 32 मिनट से शुरू होकर 15 जुलाई की रात 12 बजकर 55 मिनट तक रहेगी.
रथ यात्रा का महत्व
रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, जिनमें विष्णु, कृष्ण, वामन और बुद्ध भी शामिल हैं. भारत में जिस तरह होली, दीपावली, रक्षाबंधन, बैसाखी, ईद और क्रिसमस का महत्व है उसी तरह पुरी की रथ यात्रा भी बेहद महत्वपूर्ण है. इस पर्व को अटूट, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है. पुरी के अलावा भी देश के अलग-अलग शहरों में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है.