सरदार पटेल ने केवल सीमाओं का नहीं, आधुनिक भारत की संस्थागत चेतना का भी किया एकीकरण: न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा

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आईआईएएस शिमला में ‘सरदार पटेल की दृष्टि’ पर त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
आवाज़ जनादेश/शिमला
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला में ‘सरदार पटेल की दृष्टि: एकीकरण, एकात्मता और संघवाद’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हो गया। समापन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र-निर्माण संबंधी योगदान को केवल रियासतों के भारत में विलय तक सीमित रखना उनके विराट व्यक्तित्व का अधूरा मूल्यांकन होगा। उन्होंने भारत के राजनीतिक भूगोल को एकीकृत करने के साथ-साथ एक सुदृढ़ संस्थागत और प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखी, जो आज भी देश की स्थिरता का आधार है।
संस्थान के पुस्तकालय सभागार में आयोजित इस सत्र की अध्यक्षता भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की अध्यक्षा प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार ने की।
संगोष्ठी के मुख्य बिंदु और वक्ताओं के विचार

न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा ने रेखांकित किया कि सरदार पटेल के लिए राष्ट्रीय एकीकरण केवल मानचित्र पर सीमाओं को जोड़ना नहीं था, बल्कि लोगों और संस्थाओं को एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ना था। अखिल भारतीय सेवाओं की आवश्यकता पर उनका बल यह दर्शाता है कि एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की शक्ति निष्पक्ष और सक्षम संस्थाओं में निहित होती है।
न्यायमूर्ति शर्मा ने न्याय की संवैधानिक दृष्टि और संस्थागत शिक्षा के गहरे संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि न्याय केवल न्यायालय के निर्णयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक की गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा है। उन्होंने विधिक परिस्थितियों के अनुसार न्यायिक शिक्षा और सतत प्रशिक्षण को आवश्यक बताया।
संस्थान की अध्यक्षा प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि स्वतंत्रता के समय भारत की भाषायी, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं को एक सुसंगठित प्रशासनिक राष्ट्र-व्यवस्था में बदलना एक बड़ी चुनौती थी। सरदार पटेल ने अपनी अद्भुत संगठन क्षमता से इस विविधता को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित किया। उनके लिए ‘एकता’ का अर्थ एकरूपता नहीं, बल्कि साझा राष्ट्रीय चेतना था।
सरदार पटेल के चिंतन का समकालीन महत्व
प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार ने कहा कि केंद्र-राज्य संबंध, संस्थागत क्षमता, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे प्रश्न आज भी भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में हैं। इसलिए समकालीन भारत को समझने के लिए सरदार पटेल के विचारों का गंभीर पुनर्पाठ आवश्यक है।
इससे पहले, संस्थान के निदेशक प्रोफेसर हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक एकीकरण के साथ-साथ भारतीय संघवाद, प्रशासनिक संस्थाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में सरदार पटेल के विचारों पर निरंतर शोध की आवश्यकता है।
देश-विदेश के विद्वानों ने रखा पक्ष
संगोष्ठी के सह-संयोजक एवं संस्थान के अध्येता डॉ. गुरप्रीत सिंह ने तीन दिवसीय विमर्श की रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने प्रत्यक्ष और ऑनलाइन माध्यम से हिस्सा लिया। इस दौरान:
* देशी रियासतों के विलय (हैदराबाद, कश्मीर, ओडिशा, पंजाब की पहाड़ी रियासतें)
* भारतीय सिविल सेवा और गांधीवादी राज्य-शिल्प
* केंद्र-राज्य संबंध और राजकोषीय संघवाद जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर शोधपरक विचार साझा किए गए।
सत्र का संचालन संस्थान के अकादमिक संसाधन अधिकारी डॉ. राजीव कुमार मिश्रा ने किया। अंत में संस्थान के सचिव मेहर चंद नेगी ने सभी अतिथियों, शोधकर्ताओं और सहयोगियों के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

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