जुब्बल नरेश की दूरगामी दृष्टि: 1945 का वो ‘पौधा’ जो आज बना उत्तर भारत का सर्वश्रेष्ठ कन्या महाविद्यालय
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विशेष लेख: शिमला से रूप सिंह वर्मा के संस्मरणों और कॉलेज के गौरवशाली इतिहास पर आधारित
शिमला। इतिहास वही रचाते हैं जिनकी सोच अपने समय से आगे होती है। वर्ष 1945 में जब देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, तब शिमला की पहाड़ियों में शिक्षा की एक ऐसी क्रांति की नींव रखी जा रही थी, जिसने आने वाली पीढ़ियों का भाग्य बदल दिया। यह कहानी है जुब्बल रियासत के राजा की, जिन्होंने अपने पूर्वज की स्मृति में ‘राणा पदम चंद्रा सनातन धर्म भार्गव (RPCSDV) महाविद्यालय’ की स्थापना की। आज यही संस्थान राजकीय कन्या महाविद्यालय (RKMV) के नाम से न केवल हिमाचल, बल्कि उत्तर भारत में महिला शिक्षा का सिरमौर बना हुआ है।

एक राजा का संकल्प: मुफ्त शिक्षा की सौगात
तत्कालीन पंजाब सरकार की पंजाब यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त इस कॉलेज की स्थापना राजा राणा जुब्बल द्वारा की गई थी। उस दौर में राजा की सोच कितनी हृदयस्पर्शी थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने जुब्बल रियासत के युवाओं और युवतियों के लिए मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया था। शिक्षा के प्रति यह समर्पण ही था जिसने इस दुर्गम क्षेत्र में ज्ञान का उजाला फैलाया।
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1977: एक नया मोड़ और महिला सशक्तिकरण
समय के साथ संस्थान का स्वरूप बदला। वर्ष 1977 में हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार और शिक्षा मंत्री दौलत राम चौहान ने महिला शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इसे राजकीय कन्या महाविद्यालय में परिवर्तित कर दिया। 1978 में यहाँ छात्राओं की संख्या 919 थी, जो आज बढ़कर 3500 के पार पहुँच चुकी है। यह प्रदेश का पहला और एकमात्र पूर्णतः सरकारी कन्या महाविद्यालय है।
यादों के झरोखे से: जब गुरुओं ने गढ़ा व्यक्तित्व
कॉलेज के पूर्व विद्यार्थी और एनसीसी के सीनियर अंडर ऑफिसर (SUO) रहे 70 वर्षीय श्री रूप सिंह वर्मा (जो वर्तमान में एक प्रख्यात लेखक भी हैं) अपने अनुभवों को साझा करते हुए भावुक हो जाते हैं। वे बताते हैं कि उस समय प्रो. भटनागर, महाराष्ट्र से आईं अंग्रेजी की प्रो. उषा बांदे, केमिस्ट्री के प्रो. श्यामसुंदर, पोल साइंस के प्रो. बी.आर. शर्मा और रमेश जैरथ, प्रो. सुनील कुमार शर्मा (NCC अधिकारी), प्रो. आई.एम. शर्मा, प्रो. अवतार सिंह, प्रो. उषा बलजीत सिंह और संस्कृत के प्रो. खाना जैसे दिग्गजों ने यहाँ शिक्षा की गुणवत्ता को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। प्राचार्य आर.के. मेहरोत्रा के कुशल नेतृत्व में उस दौर में अनुशासन और ज्ञान का अद्भुत मेल था।

आधुनिक सुविधाएं और भविष्योन्मुखी कोर्सेज
वर्तमान में कॉलेज की प्राचार्या डॉ. नम्रता टिक्कु के मार्गदर्शन में संस्थान नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।
* कोर्सेज: यहाँ पारंपरिक विषयों के अलावा बीसीए, माइक्रोबायोलॉजी, पीजीडीसीए जैसे सेल्फ-फाइनेंसिंग कोर्स और जर्नलिज्म, ई-कॉमर्स व ट्रैवल एंड टूरिज्म जैसे ऐड-ऑन कोर्सेज उपलब्ध हैं।
* सुविधाएं: छात्राओं के लिए कंप्यूटर लैब, पुस्तकालय, फिटनेस सेंटर, ऑडिटोरियम, बैंकिंग सुविधा और डिस्पेंसरी जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं हैं। कॉलेज की पत्रिका ‘पद्मा’ छात्राओं की प्रतिभा को निखारने का एक सशक्त माध्यम है।
सांध्यकालीन संगीत विद्यालय: एक अनोखी पहल
आर.के.एम.वी. की सबसे विशिष्ट पहचान यहाँ का सांध्यकालीन संगीत विद्यालय है। यहाँ आयु की कोई सीमा नहीं है। 10 वर्ष से लेकर किसी भी उम्र के लोग संगीत में ‘विशारद’ की डिग्री ले सकते हैं। वहीं 6 वर्ष से ऊपर के बच्चों के लिए हॉबी क्लासेस संचालित की जाती हैं, जहाँ कॉलेज के अनुभवी प्रोफेसर स्वयं वोकल और इंस्ट्रूमेंटल संगीत सिखाते हैं।
उपलब्धियों का आकाश
इस महाविद्यालय की मिट्टी ने देश को कई रत्न दिए हैं। यहाँ से पढ़ी छात्राएं आज उच्च पदों पर आसीन हैं, जिनमें:
* विजय ठाकुर (IFS)
* तिलोतमा वर्मा (IPS)
* एकता कापटा (HAS)
* मीरा सिंह (प्रिंसिपल, लॉरेट स्कूल शिमला)
रैंकिंग और विजन:
गुणवत्ता के मामले में इस महाविद्यालय को नॉर्दर्न इंडिया में प्रथम रैंकिंग से नवाजा गया है। प्राचार्या डॉ. नम्रता टिक्कु का कहना है कि प्रशासन का एकमात्र लक्ष्य छात्राओं के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण और कैंपस में कड़ा अनुशासन बनाए रखना है।
राजा राणा जुब्बल की वह ‘पहल’ आज एक वटवृक्ष बन चुकी है। यह महाविद्यालय इस बात का प्रमाण है कि यदि नींव नेक इरादों और दूरगामी सोच पर रखी जाए, तो वह पीढ़ियों का भविष्य संवारती रहती है।

“शिमला का वो कॉलेज, जहाँ राजा ने दी थी अपनी प्रजा को मुफ्त शिक्षा की सौगात – आज बना उत्तर भारत की बेटियों की पहली पसंद।”
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