हिमाचल का वित्तीय भविष्य और सियासत की बिसात

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हिमाचल के हकों पर ‘सियासी वॉकआउट’: आखिर प्रदेश की आर्थिकी का उत्तरदायी कौन?

हिमाचल प्रदेश की देवभूमि आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ वित्तीय स्थिरता और राजनीतिक निष्ठा के बीच का फासला गहराता जा रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक महज एक चर्चा का मंच नहीं थी, बल्कि यह प्रदेश के भविष्य की सुरक्षा का एक लिटमस टेस्ट था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब राज्य के राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grant – RDG) जैसे अस्तित्व से जुड़े मुद्दे पर एकजुटता की दरकार थी, तब मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने चर्चा की मेज छोड़कर भागना बेहतर समझा।
संवैधानिक अधिकार बनाम राजनीतिक चुप्पी

संविधान के अनुच्छेद 275 (1) के तहत मिलने वाला राजस्व घाटा अनुदान कोई खैरात नहीं, बल्कि एक राज्य का संवैधानिक अधिकार है। 1952 से चली आ रही यह व्यवस्था संघीय ढांचे की वह धुरी है जो हिमाचल जैसे सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी राज्यों की आर्थिकी को थामे रखती है। मुख्यमंत्री का यह सवाल जायज है: क्या भाजपा के लिए प्रदेश के हित उसकी दिल्ली स्थित आलाकमान की खुशहाली से छोटे हैं? 16वें वित्त आयोग के समक्ष यदि RDG को बंद करने का प्रस्ताव आता है, तो यह हिमाचल की कमर तोड़ देगा। ऐसे में विपक्षी दल की चुप्पी और बैठक से पलायन न केवल उनकी ‘दुविधा’ को दर्शाता है, बल्कि उनके प्रदेश-प्रेम पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

आंकड़ों का आईना: कथनी और करनी का अंतर
आंकड़े झूठ नहीं बोलते। पूर्व भाजपा सरकार के दौरान केंद्र से मिले 54,000 करोड़ रुपये के राजस्व घाटा अनुदान और 16,000 करोड़ रुपये के GST मुआवजे के मुकाबले वर्तमान सरकार को अब तक केवल 17,000 करोड़ रुपये ही मिले हैं। इसके बावजूद भाजपा का यह कहना कि ‘सरकार दिशाहीन है’, अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने जैसा है।
“जब प्रदेश 2023 की भीषण आपदा से जूझ रहा था, तब भी भाजपा ने विशेष राहत पैकेज के प्रस्ताव पर सदन से वॉकआउट किया था। इतिहास खुद को दोहरा रहा है—मुद्दे बदलते हैं, लेकिन भाजपा का ‘हिमाचल विरोधी’ रवैया नहीं बदलता।”
विपक्ष का तर्क: हकीकत या बहाना?

विपक्ष का यह आरोप कि राज्य सरकार केंद्र की योजनाओं में अपनी हिस्सेदारी नहीं दे रही, वित्तीय कुप्रबंधन के पुराने राग जैसा प्रतीत होता है। यदि केंद्र रेलवे, सड़क और जल शक्ति मिशन में सहयोग कर रहा है, तो उसका स्वागत है। लेकिन बुनियादी सवाल ‘राजस्व घाटा अनुदान’ का है, जो दैनिक प्रशासन, वेतन और पेंशन के लिए अनिवार्य है। क्या भाजपा नेता इस बात से इनकार कर सकते हैं कि इस अनुदान के बिना प्रदेश की विकास दर ठप हो जाएगी?

एकजुटता की अपील और भविष्य की राह
सराहनीय है कि CPI(M), आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने राजनीति से ऊपर उठकर प्रदेश हित में मुख्यमंत्री का साथ देने का निर्णय लिया है। राकेश सिंघा और अन्य विपक्षी प्रतिनिधियों का समर्थन यह सिद्ध करता है कि मुद्दा ‘कांग्रेस बनाम भाजपा’ का नहीं, बल्कि ‘हिमाचल बनाम आर्थिक संकट’ का है।
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन राज्य की संस्थागत मजबूती सर्वोपरि होनी चाहिए। भाजपा नेताओं को यह समझना होगा कि जनता का दबाव उन्हें बैठक तक तो ले आया, लेकिन बैठक से उनका ‘एग्जिट’ उनकी वैचारिक हार है। यदि वे आज हिमाचल के हकों के लिए प्रधानमंत्री के सामने खड़े होने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं, तो आने वाले समय में जनता उनसे उनकी इस ‘चुप्पी’ का हिसाब जरूर मांगेगी।
वक्त आ गया है कि प्रदेश की राजनीति ‘दोषारोपण’ से निकलकर ‘अधिकारों के संरक्षण’ की ओर मुड़े। अन्यथा, यह ‘दुविधा’ हिमाचल की आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत महंगी साबित होगी।

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