केसीसी बैंक में पॉलिटिकल ब्लास्ट के आसार !

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चेयरमैन के पद के लिए संगठन के लोग शांता की पसंद के खिलाफ
हजारों बच्चों के सपने रौंदने वाले बैंक में नेताओं का अपना रुदन

वेवाक कलम कांगड़ा।
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इस फोटो में जो आपको बिजली की तारों का जाल दिख रहा है, ठीक इसी तरह के जाल में केसीसी बैंक फंसता नजर आने शुरू हो गया है। खबर है कि जल्द ही कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक में पॉलिटिकल शार्ट सर्कट होने वाला है। वजह होगा,वो हाई वोल्टेज करंट जो भाजपा काडर में दौड़ रहा है। दरअसल, हल्ला यह मचा हुआ है कि एक बार फिर से बैंक के चेयरमैन की हॉट सीट पर शांता कुमार के अनन्य भक्त डॉ राजीव भारद्वाज को बिठाने का बंदोबस्त किया जा रहा है। डॉ भारद्वाज को चन्द रोज पहले ही सरकार ने बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का मेम्बर नॉमिनेट किया गया है।

जबकि हकीकत यह है कि इस बार के चुनावों में भाजपाई पृष्ठभूमि के एक दर्जन के करीब नेता इलेक्शन लड़ कर जीते हैं। किसी जोड़तोड़ की कोई जरूरत सरकार को नहीं है। इन इलेक्टेड मेम्बर्स का मानना है कि जब इलेक्टेड हैं तो नॉमिनेटेड को चेयरमैन का ताज क्यूँ ? साफ ऐलान कर दिया गया है कि या तो पार्टी कैडर के लोगों को चुने या फिर,नेता विशेष की पसंद को चुने। कम से कम यह तो पता चले कि कदर पार्टी के आम आदमी की है या फिर नेता विशेष के खास आदमी की ?

पुख्ता सूत्रों के मुताबिक अब सरकार के भीतर भी यह खलबली मच गई है कि इस चक्रवाती तूफान से कैसे निपटा जाए ? एक बहुत बड़ा धड़ा इस पक्ष में है कि इलेक्टेड मेम्बर्स में से किसी एक को अध्यक्ष बनाया जाए। इनको यह डर भी सता रहा है कि अगर कहीं काडर के लोग खफा हुए तो 2022 में इनकी जरूरत सबको पड़ेगी। यह खफा हुए तो असर बड़े नेताओं पर भी पड़ेगा।

खबरों के मुताबिक जल्द ही इलेक्टेड मेम्बर्स का समूह मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से धर्मशाला में मिलेगा और अपनी बात उनके समक्ष रखेगा। तय है कि मुख्यमंत्री भी इस दुविधा से आसानी से छुटकारा हासिल नहीं कर पाएंगे। एक तरफ भाजपा के मूल कैडर की जड़े होंगी तो दूसरी तरफ शांता कुमार जैसे सियासी वट वृक्ष की जड़ें ? देखना यह भी दिलचस्प होगा कि शांता कुमार का दिल कैडर के लिए पिघलता है या फिर अनन्य भक्त के प्रति हठ योग की मुद्रा में रहता है ?

मगर दुःखद पहलू यह है कि यह वही बैंक जिसने भर्तियां दरकिनार करके हजारों युवाओं के रोजगार के सपने को तबाह करके रख दिया था। युवा चीखते-चिल्लाते रहे पर,इसी बैंक प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा था। आज जब खुद अपने सपनों को पंख लगाने की बात आई है तो सभी फड़फड़ा रहे हैं। गिड़गिड़ा रहे हैं। कैडर की बाते हो रहीं हैं। कोई इन बेमुरव्वत लोगों से पूछे कि कैडर बड़ा है या फिर जनता ? जनता से कैडर होता है,कैडर से जनता नहीं…

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